Karwa chauth brat katha in hindi| करवा चौथ व्रत कथा

करवा चौथ व्रत कथा|karva chauth vrat katha in hindi
Karva chauth vrat katha
Karva chauth vrat


करवा चौथ का व्रत हमारे हिन्दू धर्म 
 की परंपरा के अनुसार सुहागन महिलाएँ बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ करती है परंतु कई बार उनके मन में ये ख्याल आता है कि करवा चौथ व्रत क्यों मनाया जाता है, इसकी शुरुआत कब से हुई, इसके पीछे कौन सी कहानी है । देखिए इस के बारे में तो कई कहानियाँ प्रचलित है परंतु कई लोगों को इन कहानियों से अपने प्रश्न का उत्तर नही मिलता लेकिन आज हम जो कहानी बताने जा रहा है उससे यकीनन आपकी जिज्ञासा शांत हो जाएगी। तो चलिए कहानी शुरू करें।

करवा चौथ व्रत कथा, सती सावित्री की कथा  

प्राचीन काल की बात है। मद्ध देश के राजा अश्वपति बड़े प्रतापी राजा थे। उनकी एक पुत्री थी जो बड़ी सुंदर सुशील और तेजस्वी थी। उसका नाम था सावित्री । एक दिन बगीचे में भ्रमण करते हुए उनकी मुलाकात राजा धृमत्सेन के पुत्र सत्यवान से हुई जो किसी कारणवश अपना राज्य छोड़कर अपने अंधे माता पिता के साथ आश्रम में रहते थे। राजकुमार सत्यवान बड़े धर्मात्मा,माता-पिता के भक्त,और चरित्रवान थे। राजकुमारी सावित्री को सत्यवान से प्रेम हो गया। अतः उन्होंने सत्यवान से विवाह करने का निश्चय कर लिया। एक बार देवर्षि नारद सावित्री के महल में आये। उन्होंने सावित्री को बताया कि जिस राजकुमार से तुम विवाह रचाने जा रही हो उसकी तो आयु अब मात्र एक साल बची हुई है इसलिए तुम उससे विवाह मत करो। सावित्री तो सत्यवान को मन ही मन अपना पति मान चुकी थी इसलिए वह अपने वचन पर अड़ी रही। कुछ दिन के बाद सावित्री का सत्यवान के साथ विवाह सम्पन्न हो गया। सावित्री महल छोड़ कर आश्रम में आ गई और अपने पति और सास-ससुर की सेवा करने लगी
धीरे-धीरे समय पंख लगा कर उड़ गया। सत्यवान की आयु का आखिरी दिन भी आ गया। सत्यवान को तो कुछ पता नही था। उसने  प्रतिदिन की भाँति कुल्हाड़ी उठाई और लकड़ी काटने चल दिया।
सावित्री ने भी सत्यवान से साथ चलने का आग्रह किया। अपने पति और सास-ससुर से स्वीकृति मिलने के बाद सावित्री भी पति के साथ जंगल में चली आई क्योंकि उन्हें तो सब पता था लेकिन उन्होंने और किसी को यह बात नही बताई थी।
जंगल में लकड़ी काटते हुए सत्यवान को चक्कर आया और वह जमीन पर गिर पड़े। तभी यमराज सत्यवान के प्राण ले जाने के लिए प्रकट हुए। सावित्री ने यमराज से अपने पति प्राणों की भीख मांगी। यमराज बोले तुम्हारे पति की आयु पुर्ण हो चुकी है इसलिए मुझे तुम्हारे पति के प्राण लेने ही पड़ेंगे। सावित्री ने यमराज से काफी देर तक याचना की परंतु यमराज सत्यवान के प्राण ले कर यमलोक को चल पड़े। सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने उन्हें काफी समझाने की कोशिश की लेकिन सावित्री वापस लौटने को तैयार नही हुई। यमलोक के द्वार पर पहुंच कर यमराज बोले " देवी अब तुम लौट जाओ क्योंकि यमलोक में किसी जीवित मनुष्य का प्रवेश करना निर्षिद्ध है। सावित्री ने कहा " प्रभु आप मेरे भी प्राण ले लो परंतु मुझे मेरे पति से अलग मत करो। यमराज सावित्री के दृढ निष्ठा और पतिव्रता धर्म से बहुत प्रसन्न हुए। अत: वे बोले " देवी मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ इसलिए तुम अपने पति के प्राण छोड़कर कोई भी वर मांग लो। सावित्री ने कहा " प्रभु आप मुझे पुत्रवती होने का वरदान दे दो,मैं वापस लौट जाउंगी। यमराज तो किसी तरह उनसे पिछा छुड़ाना चाहते थे अतः उन्होंने बिना सोचे समझे "तथास्तु:"  कह दिया। तभी उन्हें अपने गलती का एहसास हुआ क्योंकि बिना पति के पुत्रवती होना कैसे संभव था। अब वे एक पतिव्रता स्त्री से हार चुके थे ।अंततः उन्होंने सत्यवान का प्राण लौटा दिया और सावित्री के बुद्धिमानी और पतिव्रता धर्म से प्रसन्न होकर सत्यवान को चार सौ वर्षो तक निरोग और चिरंजीवी होने का वरदान भी दिया। सावित्री के निष्ठा और पतिव्रता धर्म के कारण उनका नाम "पंचकन्याओं" में गिना जाता हैं। चूंकि उस दिन कार्तिक चतुर्थी का दिन था इसलिए तभी से सुहागन स्त्रियाँ सावित्री से प्रेरित होकर हर वर्ष कार्तिक माह के  चतुर्थी को कठिन व्रत करके अपनी पतिव्रता शक्ति के द्वारा भगवान शिव और माता पार्वती को प्रसन्न करके अपने पति के निरोग और दीर्घायु होने का वरदान मांगती है। 
वैसे भी उपवास रखने के और भी वैज्ञानिक और अध्यात्मिक लाभ है।

व्रत करने के वैज्ञानिक लाभ

 उपवास करने से हमारे पाचनतंत्र को आराम मिलता है और पेट साफ हो जाता है जिसके फलस्वरूप हमारे शरीर की पाचन शक्ति बढ़ जाती है ।

व्रत करने का अध्यात्मिक लाभ

व्रत करने से हमारी संकल्प शक्ति बढ़ती है। हमारा मन शांत होता है, हमारा मन नकारात्मक ऊर्जा से मुक्त हो जाता है,मन की एकाग्रता में वृद्धि होती है और हमारे मन में धर्मिक विचारों का प्रवाह होता है।

करवा चौथ व्रत पति-पत्नी के दाम्पत्य जीवन के लिए भी काफी महत्वपूर्ण है,क्योंकि इस व्रत में पत्नी अपने लिए नही अपने पति के लिए करती है जो एक पत्नी के अपने पति के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
जिससे पति के दिल में भी अपने पत्नी के लिए प्रेम का भाव उमड़ता है इसलिए यह व्रत पति-पत्नी के बीच प्रेम और विश्वास उत्पन्न करता है । अतः हर सुहागन स्त्री को यह व्रत अवश्य करना चाहिए। एक बात और किसी विशेष रोग से पीड़ित या गर्भवती महिलाओं को बिना अपने डॉक्टर से सलाह लिए ये व्रत नही करना चाहिए।

इसे भी पढ़े :करवा चौथ कब है, करवा चौथ व्रत विधि और सामग्री

• आपके मन में उठने वाले सवाल 

करवा चौथ में भगवान शिव की पूजा ही क्यों होती है ? 

उत्तर : हिन्दू शास्त्रों के अनुसार भगवान शिव काल और संहार के देवता माने जाते है और यह व्रत पति के लम्बी उम्र के लिए किया जाता है इसलिए इसमे भगवान शिव की पूजा की जाती है । माता पार्वती ने भी भगवान शिव जी को पति के रूप में पाने के लिए बहुत कठिन तप किया था इसलिए उनका नाम भी पतिव्रता स्त्रियों में लिया जाता है । यह भी एक कारण हो सकता है ।

 करवा चौथ में चन्द्रमा की पुजा क्यों होती है ? 

उत्तर : चन्द्रमा प्रेम और सुन्दरता का प्रतीक है इसलिए चन्द्रमा की भी पुजा होती है ।

करवा माता कौन थी और उनकी पुजा क्यों होती है ? 
उत्तर : प्राचीन काल में एक करवा नाम की पतिव्रता स्त्री नें पतिव्रता धर्म की शक्ति से अपने पति के प्राणों की रक्षा की थी,इसलिए सुहागन महिलाएँ उनको आदर्श मान कर उनकी पुजा करती है ।

नोट :अदि आपके मन में भी इस विषय में कोई सवाल या संदेह हैं तो आपका स्वागत है । कृपया नीचे कमेंट बॉक्स में अपना विचार प्रकट करें । धन्यवाद 

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