कोरोनावायरस जैसे प्राकृतिक आपदाओं के लिए जिम्मेदार‌ कौन है ?

प्राकृतिक आपदाओं के कारण और परिणाम

Nature disaster in India
Nature disaster
कोरोना वायरस के बारे में संपूर्ण जानकारी
पिछले कुछ वर्षों से पृथ्वी पर कुछ ज्यादा ही उथल-पुथल मचा हुआ है। कभी बाढ़, कभी भूकंप, कभी सुनामी तो कभी महामारी। इन प्राकृतिक आपदाओं की वजह से इस पृथ्वी पर जीवन यापन मुश्किल लगने लगा है। इस वक्त भी पूरी दुनिया में कोरोना महामारी के कहर से हाहाकार मचा हुआ है। इस वायरस के संक्रमण से लाखों लोग बीमार हो रहे हैं।और हजारों लोग मारे जा चुके हैं। विज्ञान और टेक्नोलॉजी इस वायरस को रोकने में नाकाम सिद्ध हो रहा है। पूरी दुनिया में इस वक्त शोक, अशांति,भय और दुख का माहौल है। इस महामारी के लिए कुछ लोग चीन के अप्राकृतिक खानपान को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, तो कुछ लोग ईश्वर को दोष दे रहे हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषक तो इस वायरस को चीन का जैविक हथियार बता रहे हैं। परंतु अभी तक इसका कोई ठोस सबूत नहीं मिल पाया है। इसलिए इस विषय पर पुख्ता तौर पर कुछ कहा नहीं जा सकता। फिर प्रश्न उठता है इन हजारों लोगों के मौत का जिम्मेदार कौन है।  इस विषय पर आगे बढ़ने से पहले हम आपको एक छोटी सी कहानी सुनाना चाहते हैं। अगर आप इस कहानी का मर्म समझ गए तो बाकी बातों को समझना भी आपके लिए आसान हो जाएगा।

एक छोटी सी प्रेरणादायक कहानी

 एक शहर में एक बहुत विशाल आम का पेड़ था। ग्रीष्म ऋतु आते-आते वह पेड़ फलों से लग जाता था। चूंकि वह पेड़ सड़क के किनारे था इसलिए उस पर किसी का निजी अधिकार नहीं था। उस राह से गुजरने वाले राहगीर कुछ देर उस पेड़ के शीतल छांव में सुस्ताते और पेड़ से गिरने वाले मीठे मीठे फलों का आनंद लेते। कुछ देर आराम करते और अपने रास्ते चले जाते। वह परोपकारी आम का पेड़ राहगीरों की सेवा करके अत्यंत आनंदित होता था। एक दिन कुछ उद्दंड लड़के आए और उत्पात मचाने लगे। वे कभी पेड़ पर पत्थर मारते तो कभी पेड़ पर चढ़कर उसकी शाखाओं को जोर-जोर से हिलाने लगते। जिससे पेड़ के कच्चे पक्के आम टूटकर गिरने लगे। उन्होंने उस पेड़ की कुछ शाखाएं भी तोड़ डाली। आम के पेड़ को बड़ा दुख हुआ। लेकिन वह परोपकारी और शांतिप्रिय आम का पेड़ चुपचाप सहता रहा। उस पेड़ पर मधुमक्खीयों का एक छत्ता भी लगा हुआ था। पेड़ की बुरी हालत देखकर मधुमक्खियों को गुस्सा आ गया और उन्होंनेे उन पर हमला कर दिया। । फिर वो पत्थर मारने वाले लड़के हो, उस राह से गुजरने वाले राहगीर हो या आसपास रहने वाले लोग।सबको उन्होंने जम कर काटा। चारों ओर हाहाकार मचवा दिया।
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प्रकृति का गुनाहगार कौन

क्या आप बता सकते हैं कि जब दोषी वे उद्दंड लड़के थे तो फिर मधुमक्खियों ने निर्दोष लोगों को क्यों काटा। क्योंकि मधुमक्खियों ने जिन लोगों को काटा वे वहीं बुद्धिजीवी लोग थे। जो उन लड़कों को मना करने के बजाए चुपचाप तमाशा देख रहे थे। इसलिए दोष उनका भी था क्योंकि प्राकृति के नियमों के अनुसार पाप करने वाला और खड़े होकर पाप देखने वाला दोनों दोषी होते हैं, जैसे महाभारत में भीष्म पितामह को दोषी माना जाता है। इसलिए कोरोना महामारी के लिए हम किसी एक को जिम्मेदार नहीं ठहरा सकते। इसके लिए हम सभी समान रूप से जिम्मेदार हैं। क्योंकि हम सभी ने प्राकृति के साथ खिलवाड़ किया है। आज हम कोरोनावायरस महामारी के लिए चीन को जिम्मेदार ठहरा रही है। क्योंकि चीन में जंगली जानवरों को मारकर खाया जाता है, जिससे यह महामारी उत्पन्न हुआ। लेकिन क्या हमने कभी अपने गिरेबान में झांक कर देखा है। हमारे देश में भी तो मुर्गी,बकरी,गाय,भैंस,सुअर, भेड़ जैसे पालतू जानवरों और हिरण,मोर, नीलगाय,चुहे, अंधे सांपों, और मछलीयों‌ सहित कई पशु-पक्षियों को मारकर खाया जाता है। फिर हम केवल चीन को जिम्मेदार कैसे ठहरा सकते हैं। हम सभी प्राकृति के गुनहगार है। और हमें हमारे गुनाहों की सजा मिलनी ही चाहिए।

परोपकारी प्रकृति और स्वार्थी इंसान


प्रकृति ने हमें क्या नहीं दिया। हमें पांच तत्वों से बना इतना सुंदर शरीर दिया। जीने के लिए स्वच्छ वायु दिया। पीने के लिए शुद्ध जल दिया। हमारे भोजन के लिए हजारों प्रकार के फल-सब्जियां, अनाज और कंदमूल दिए। उसने हम इंसानों को सुंदर-सुंदर पर्वत दिया। कल-कल करती नदियां और सुंदर झील झरना दिया। तरह-तरह के पेड़ पौधे और वनस्पतियां दी। सुहाने मौसम दिए। रोशनी के लिए सूरज और शीतलता के लिए चंद्रमा दिया। इसने हमारे मनोरंजन के लिए रंग-बिरंगे फूल तितलियां और सुंदर-सुंदर पशु-पक्षी दिए। लेकिन हम इंसानों ने प्राकृतिक के इन सौगातों को संरक्षित करने के बजाए इसे बर्बाद करके रख दिया। हमने अपने शारीरिक सुख और स्वार्थ के लिए प्राकृतिक संसाधनों का जी भरकर दुरुपयोग किया।

प्राकृतिक संसाधनों का दुरुपयोग


प्रकृति ने हमें स्वच्छ वायु दिया था। परंतु हमने औधोगिक विकास के नाम पर स्वच्छ वायु को जहरीले धुएं से भर दिया। शुद्ध जल से कल-कल करते जल स्रोतों को हमने कल कारखानों के गंदे पानी और शहरी विकास के कचरो से भर दिया। प्रकृति के दिए 36 भोगों को खाकर भी हमारा पेट नहीं भरा तो हम अपने से कमजोर और असहाय जीव-जंतुओं को मारकर खाने लगे। जिन गाय और भैंसों ने अपने बच्चों की परवाह ना करके हमें अपना दूध पिलाया। हम इंसान उनकी रक्षा करने के बजाय अपने इंद्रियों सुख की प्राप्ति के लिए हम उनकी भी हत्या करने लगे। वाह रे इंसान।

प्राकृतिक आपदा की परिभाषा


क्या यही हम इंसानों की इंसानियत और वफादारी है। जिस प्रकृति ने हमें इतने बहुमूल्य उपहार दिए हम उसी को तबाह करने पर तुले हुए हैं। यह प्राकृति सदियों से हमारे अत्याचारों को सहते आ रही है। परंतु हमारे अत्याचारों से प्राकृतिक असंतुलन पैदा हो गया है। और जब प्राकृतिक असंतुलन पैदा होता है तो प्रकृति इसे संतुलित करने का प्रयास करती है, जिसे हम प्राकृतिक आपदा कहते हैं। कोरोनावायरस जैसी प्राकृतिक आपदाएं हमें ये समझाने के लिए आती है कि हमें अपने जीवन शैली और आदतों में बदलाव करने की जरूरत है। अगर हम अब भी नहीं समझे तो हमारी मानव जाति का विनाश निश्चित हैं। और इसके जिम्मेदार सिर्फ हम होंगे हम इंसान।

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