true love story in hindi-पति-पत्नी के अद्भुत प्रेम की सच्ची कहानी

true love story in hindi
कल्पनिक चित्र

true love story in hindi heart touching


दोस्तों आज तक तो आपने प्रेमी-प्रेमिकाओं की बहुत सी कहानियां पढ़ी या सुनी होगी। लेकिन आज हम जो कहानी बताने जा रहे हैं वह एक पति-पत्नी के अद्भुत प्रेम की कहानी है। यह कहानी है सात फेरों के उन सात वचनों की,यह कहानी है सच्चे प्रेम और विश्वास के पराकाष्ठा की।
यह कहानी अलवर (राजस्थान) के एक छोटे से कस्बे के निवासी विजेन्द्र सिंह राठौड़ और उनकी धर्मपत्नी लीला की है। विजेंद्र एक ट्रेवल एजेंसी में कार्यरत थे। जिससे उनकी ठीक-ठाक आमदनी हो जाती थी। इस तरह वे अपने पत्नी और तीन बच्चों के साथ सुखमय जीवन व्यतीत कर रहे थे। बात 2013 की है एक दिन लीला ने विजेंद्र से आग्रह किया की वह चारों धाम की यात्रा करना चाहती हैं। विजेंद्र अपनी प्यारी पत्नी की हर इच्छा को पूरा करने का प्रयत्न करते थे। इसलिए वे अपनी पत्नी के इस आग्रह को ठुकरा ना सके। उन्होंने अपनी ही ट्रेवल एजेंसी से केदारनाथ के लिए एक टूर बुक किया। पति-पत्नी ने छोटे-छोटे बच्चों को उनके दादा-दादी के हवाले किया और अपना बोरिया बिस्तर बांधकर केदारनाथ जा पहुंचे। रात को
विजेंद्र और लीला एक लॉज में रुके थे। सुबह लीला को लॉज में छोड़ विजेंद्र कुछ दूर ही गये थे कि चारों ओर हाहाकार मच गया। उत्तराखंड में आई भीषण सैलाब का उफनता पानी केदारनाथ आ पहुंचा था। विजेंद्र ने बामुश्किल अपनी जान बचाई। कुछ देर बाद जब मौत का तांडव और उफनते हुये पानी का वेग शांत हुआ तो विजेंद्र बदहवास होकर उस लॉज की ओर दौड़े, जहाँ वह लीला को छोड़ कर आये थे। परन्तु वहाँ पहुंच कर जो नज़ारा दिखा वह दिल दहला देने वाला था। सब कुछ बह चुका था। प्रकृति के इस तांडव के आगे वहां मौजूद हर इंसान बेबस दिख रहा था।
तो क्या लीला भी .....
नहीं नहीं! ऐसा नहीं हो सकता, उसने जीवन भर मेरा साथ देने का वादा किया था। विजेंद्र ने अपने मन को समझाया।
विजेंद्र का मन कह रहा था कि "वह अभी जीवित है"  इतने वर्षों का साथ पल भर में तो नहीं छूट सकता।
परन्तु आस पास कहीं जीवन दिखाई नहीं दे रहा था। हर ओर मौत तांडव कर रही थी। लाशें बिखरी हुई थी। किसी का बेटा, किसी का भाई तो किसी का पति बाढ़ के पानी मे बह गया था।
विजेंद्र के पास लीला की एक तस्वीर थी जो हर समय उसके पर्स में रहती थी। अगले कुछ दिनों तक वह घटनास्थल पर ही हाथ में अपने पत्नी की तस्वीर लिये घूमता रहा। वह हर किसी से वह तस्वीर दिखाता और पूछता, "भाई इसे कहीं देखा है"।
और जवाब मिलता .........
"ना"
लेकिन पता नहीं वह कैसा विश्वास था, जिसमें विजेंद्र अभी भी उम्मीद का दामन थामें थामें हु था कि लीला अभी जिंदा है।
इस घटना को दो हफ्ते बीत चुके थे। परन्तु राहत बचाव कार्य अभी भी जारी था। इसी बीच उसे फौज के कुछ अफसर भी मिले जिन्होंने उससे बात की। लेकिन लगभग सबने मिलकर यहीं निष्कर्ष निकाला कि लीला बाढ़ में बह चुकी है।
लेकिन विजेंद्र ने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया।
उसने घर मे फोन मिला कर बच्चों को इस हादसे के बारे में सूचित किया। बच्चे अनहोनी के डर से घबराये हुये थे। रोती बिलखती बिटिया ने पूछा की " पापा क्या अब माँ नहीं आएगी" तो विजेंद्र ने उसे ज़ोर से फटकार दिया और कहा, चुप कर"तुम्हारी मां अभी ज़िंदा है और मैं उसे ढूंढ कर लाऊंगा।
लगभग एक महीना बीत चुका था। अपनी पत्नी की तलाश में विजेंद्र दर दर भटक रहा था। उसके हाथ मे एक तस्वीर थी और मन मे एक आशा।
"वह जीवित है"
इसी बीच विजेंद्र के घर सरकारी विभाग से एक फोन आया। फोन करने वाले कर्मचारी ने कहा कि लीला मृत घोषित कर दी गयी है और हादसे में जान गवां चुके लोगों को सरकार मुआवजा दे रही है। आप भी सरकारी ऑफिस में आकर मुआवजा ले सकते हैं।
परंतु विजेंद्र ने मुआवज़ा लेने से भी इंकार कर दिया।
परिजनों ने कहा कि अब तो सरकार भी लीला को मृत मान चुकी है। अब उसे तलाशने से कोई फ़ायदा नहीं है। परन्तु विजेंद्र ने मानने को तैयार ही नहीं था। जिस सरकारी कर्मचारी ने लीला की मौत की पुष्टि की थी उससे भी विजेंद्र ने कहा ....
"वह जीवित है"
इसी धुन में एक बार फिर से विजेंद्र लीला की तलाश में निकल पड़े। उत्तराखंड का एक एक शहर नापने लगे। हाथ मे एक तस्वीर और ज़ुबाँ पर एक सवाल " भाई इसे कहीं देखा है?" और हर सवाल का एक ही जवाब-
"ना"
लीला से विजेंद्र को बिछड़े अब उन्नीस महीने बीत चुके थे। इसी दरमियां वह लगभग एक हजार से अधिक गाँवों मे लीला को तलाश चुके थे।


इसी दौरान एक दिन उत्तराखंड के गंगोली गाँव मे एक राहीगर को विजेंद्र सिंह राठौर ने एक तस्वीर दिखाई और पूछा "भाई इसे कहीं देखा है"
राहीगर ने तस्वीर ध्यान से देखी और आश्चर्य से देखते हुए बोला-
हां मैंने इसे देखा है, यह औरत बौराई सी हमारे गाँव मे घूमती रहती है"।
विजेंद्र तुरंत राहीगर के पांव में गिर पड़े। राहीगर के साथ भागते भागते वह गाँव पहुंचे। गांव के बीच में एक चैराहा था और सड़क के दूसरे कोने पर एक महिला बैठी थी।
"लीला"
आवाज सुनते ही वह नजर उठी।
वह "नज़र" जिससे "नज़र" मिलाने को "नज़र" तरस गयी थी।
हां वह लीला ही थी। विजेन्द्र लीला को गले लगा कर काफी देर तक रोते रहे। लीला की जुदाई ने उन्हें तोड़ दिया था। भावनायें और संवेदनायें आंसूओं के रूप में आखों से अविरल बह रही थी। पत्नी की तलाश में आँखें पत्थर हो चुकी थी फिर भी भावनाओं का तीव्र वेग उन्हें चीरता हुआ बह निकला था।
लीला की मानसिक हालत उस समय स्थिर नहीं थी। इसलिए वह उस शख्स को भी नहीं पहचान पाई जो उसे इस जगत में सबसे ज्यादा प्यार करता था। विजेंद्र ने लीला को उठाया और घर ले आये। 12 जून 2013 से बिछड़े बच्चे अपनी मां को 19 महीने के अंतराल के बाद देख रहे थे। उनकी आंखों से आंसुओं का सैलाब बह रहा था।
यह 19 महीने विजेंद्र सिंह राठौर के जीवन का सबसे कठिनतम दौर था। परन्तु इस कठिनाई के बीच भी विजेंद्र के हौसले को एक धागे ने बांधे रखा था। वह "प्रेम" का धागा था। एक पति का अपनी पत्नी के प्रति प्रेम और समर्पण जिसने प्रकृति के आदेश को भी पलट कर रख दिया।  इसे एक संयोग कहें या ईश्वर का चमत्कार। कि लीला के साथ बाढ़ में बह जाने वाले अधिकतर लोग नहीं बचें थे लेकिन लीला बच गयी थी। शायद ईश्वर भी विजेन्द्र के उम्मीद के धागे को तोड़ ना सके। प्रभु को भी विजेंद्र के प्रेम और समर्पण के आगे अपना फैसला बदलना पड़ा। विजेन्द्र और लीला के अद्भुत प्रेम की इस कहानी ने पति-पत्नी के पवित्र रिश्तें की एक नई मिसाल कायम की है।



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