एक गरीब लड़के के कठिन संघर्ष और सफलता की‌ प्रेरणादायक कहानी

Real life Inspirational Story | Motivational story in Hindi for success

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दोस्तों दुनिया में जब कोई अपने failure की बात करता है, जब भी कोई अपने सपनों के टुटने की बात करता है, जब भी कोई अपनी ग़रीबी की बात करता है। तो उसके पास कोई ना कोई बहाना जरूर होता है। कोई कहता है कि मैं गरीब घर में पैदा हुआ था। कोई कहता है कि मुझे उच्च शिक्षा हासिल करने का अवसर ही प्राप्त नहीं हुआ। कोई कहता है कि मेरी तो किस्मत ही खराब है इसलिए मुझे हर बार failure का सामना करना पड़ा। तो कोई कहता है कि मेरे पास बिजनेस करने के लिए पर्याप्त पुंजी नहीं थे। इसी प्रकार हर किसी के पास कोई ना कोई excuse जरूर होता है।  परंंतु आज मैं आपको एक ऐसे loser की कहानी सुनाऊंगा। जिसने winner बनने की कसम खा रखी है। जिसने बद से बद्तर हालातों में भी हिम्मत नहीं हारी और अपनी ग़रीबी से, अपनी किस्मत से, अपने खुद की कमजोरीयों से लड़ता रहा लेकिन कभी भी कोई बहाना नहीं बनाया। दोस्तों ये कहानी किसी और की नहीं बल्कि मेरी जिंदगी की कहानी है। ये कहानी हैै मेरी ग़रीबी की।  मेरे failures की, मेरे struggling की, मेेेरे learning की और मेेेरे success की। इस कहानी में आपको love, emotion, struggle, passion, Motivation सब कुछ देखने को मिलेगी। जो शायद इस दुनिया की सबसे बेेहतरीन Motivational stories में से एक है। वैसे कहानी तो बहुत बड़ी है लेकिन मैं इस shortcut में लिखने की कोशिश करूंगा। और मैं गारंटी देता हूं कि इस कहानी को पढ़ने के बाद आपकी जिंदगी बदल जाएगी।

संघर्ष से सफलता तक की कहानी

दोस्तों मेरा नाम है दिनेश नीर और मैं आज एक Motivational speeker, video creater, YouTuber और blog writer हूं। मेरा जन्म 1993‌ में बिहार के एक छोटे से गांव में एक गरीब परिवार में हुआ था। हमारा परिवार बहुत बड़ा परिवार था। मेरे पापा दो भाई थे और दोनों भाइयों के बहू बेटों और बेटियों को मिला कर करीब 18 लोगों का परिवार था। मेरे बड़े पापा सिनेमाघरों में  टिकट मास्टर थे लेकिन उन्हें परिवार से कोई मतलब नहीं रहता थे। परिवार की जिम्मेदारी उन्होंनेेेे अपने छोटे भाई को सौंप दी थी। मेरे पापा एक सरकारी सुुुगर फैक्ट्री में चपरासी थे। और सैलरी यहीं कोई 5-6 हजार के करीब थी। जिससे ठीक-ठाक गुजारा चल जाता था। लेकिन 1998 में अचानक वह फैक्ट्री बंद हो गई। उस समय मैं तीसरी क्लास में था। फैक्ट्री बंद होने के कारण पापा की सैलरी आनी बंद हों गई और पुरे परिवार की आर्थिक हालत बिगड़ गई। वैसे हमारे परिवार में मेरे बड़े पापा और दो शादीशुदा भाई भी थे। लेकिन किसी ने भी उन्हें अपना सहयोग नहीं दिया। इधर पैसों की तंगी की वजह से पापा tension में रहने लगे और शराब पीने लगे। रोजाना शराब पीकर आना और घर में मारपीट करना उनकी आदत बन गई। इधर परिवार के बाकी लोगों ने भी रंग बदलना शुरू कर दिया।


अब तो रोजाना परिवार में महाभारत होने लगा। मार-पीट, गाली-गलौज शोर-शराबा अब रोज का काम बन गया। जिसके कारण मैं बचपन में ही depression का शिकार हो गया। उस शोर शराबे और गाली-गलौज के बीच एक 6 साल का लड़का घर के एक कोने में बैठ कर रोता और भगवान से शिकायत करता। हे भगवान आपने मुझे कहां भेज दिया। इससे अच्छा तो आप मुझे नरक भेज देते। मैं बचपन से ही चंचल, शरारती, हंसमुख, अंतर्मुखी और समझदार लड़का था। मैं जब भी किसी प्राणी को दुखी देखता। मेरा मन करूणा से भर जाता। फिर मैं मन ही मन सोचा करता कि जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो किसी को भी दुखी नहीं रहने दूंगा। परंतु अखबारों में मैं जब भी चोरी, डकैती, हत्या या दुष्कर्म इत्यादि की खबरें पढ़ता तो मेरे अंदर आग उबलने लगता। मैं सोचता कि जब मैं बड़ा हो जाऊंगा तो बुरे और पापी लोगों को सबक जरूर सिखाऊंगा। इसी सोच के साथ मैं 10 साल की उम्र से ही hard exercises करने लगा। ताकि मैं बड़ा होकर बुरी और पापी लोगों को सबक सिखा सकूं। इस तरह मेरे अंदर dual personality develop होने लगी। बचपन से ही मुझे अकेलापन भाने लगा क्योंकि सिवाय किताबों और ईश्वर के मेरा कोई दोस्त ना था जिससे मैं अपने दिल के जज़्बात शेयर करता। और सच में मुझे आज तक कोई ऐसा दोस्त नहीं मिला जो मेरे दिल की बात समझ पाएं इसलिए मुझे आज तक अकेला रहना ही पसंद है। लोग कहते हैं कि शराबी का बेटा शराबी ही होता है लेकिन मुझे शराब से इतनी नफ़रत हो गई थी कि मैंने 6 साल की उम्र में प्रतिज्ञा कर ली कि जीवन में कभी कोई नशा नहीं करूंगा। यहां मैंने एक चीज और सीखी कि जिस परिवार में बेईमानी समा जाए उसे तबाह होने से कोई नहीं रोक सकता। आखिरकार पंचों के बीच-बचाव से थोड़ी बहुत जो जमीन जायदाद थी उसका बंटवारा हुआ तब जाकर महाभारत थमा। 


बंटवारा होने के बाद हमारे परिवार की आर्थिक हालत और खराब हो गई क्योंकि पापा के पास बचत के नाम पर कुछ भी नहीं था और जमीन जायदाद भी नाम की थी। उस वक्त मैं पांचवी क्लास में पढ़ रहा था। मुझे आज भी याद है, मैं जब भी किताब या कलम खरीदने के लिए पापा से पैसे मांगता तो वे कहते कि आज किसी तरह काम चला लो बेटा कल खरीद दूंगा और यह कहते हुए पापा के आंखों में मजबूरी साफ नजर आती। मैं बचपन से ही बहुत समझदार और भावुक लड़का था। मुझमें ऐसी खुबी थी कि इंसान तो इंसान किसी जानवर की भी आंखों में देखकर उसके मन की बात पढ़ लेता था। शायद यह God gifted था। परिवार की आर्थिक स्थिति को देखते हुए मैं भी डिप्रेशन में रहने लगा। मुझे ये एहसास होने लगा कि अब शायद मैं अपनी पढ़ाई को जारी नहीं रख पाऊंगा।
अंततः मैंने दुखी मन से अपनी पढ़ाई छोड़ने का निश्चय कर लिया। जिसे पापा ने मौन स्वीकृति दे दी। जी हां दोस्तों मैंने सिर्फ पांचवी कक्षा तक ही पढ़ाई की है। लेकिन मैं पढ़ाई में इतना तेज था कि हमेशा अपने स्कूल के लड़कों में प्रथम आता। यहां मैंने सिर्फ लड़कों की बात इसलिए की क्योंकि एक लड़की थी रेखा नाम की। जो शायद मेरी पहली क्रश भी थी। वह हमेशा मुझसे एक कदम आगे ही रहती। स्कूल के टीचर हमेशा मेरी प्रशंसा करते रहते। विज्ञान के टीचर हमेशा कहते कि यह लड़का एक दिन जरूर वैज्ञानिक बनेगा क्योंकि विज्ञान में हमेशा मेरे 99% नंबर आते।


लेकिन इसे दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य कि अब मैं पापा के साथ पास के कस्बे के एक सिनेमा हॉल में साइकिल स्टैंड चलाने लगा और परिवार की रोजी-रोटी चलाने में सहयोग करने लगा। लेकिन पढ़ाई का भुत मेरे सर पर सवार हो चुका था। मुझे कहीं भी कैसी भी पुस्तक दिखाई देती मैं सब-कुछ भुल कर पढ़ने बैठ जाता। मुझे कामिक्स पढ़ने का बहुत शौक था। नागराज,सुपर कमांडो ध्रुव, परमाणु, डोगा, भोकाल, शक्ति, बांकेलाल इत्यादि। इन सबकी हजारों मैंने किराए पर ले कर पढ़ी है। उस समय शायद एक कामिक्स के एक या दो रुपए किराया लगता था। इसके अलावा उस समय की मासिक पत्रिकाएं नंदन, बालहंस, चंपक, सुमन सौरभ,सरिता, कादंबनी इत्यादि जितनी भी पत्रिकाएं थी। उनके हजारों अंक मैंने पढ़ें है। अब आप सोच रहे होंगे कि मैं इन किताबों को खरीदने के लिए पैसे कहां से लाता था। दरअसल पढ़ाई छोड़ने के बाद मैं भी पैसे कमाने लगा था। उन्हीं पैसों में से मैं प्रतिदिन 2-2 रूपए जमा करता था। इसके अतिरिक्त मुझे कभी-कभी नाश्ता करने के लिए जो 5-10 रूपए मिलते थे। मैं उनमें से भी कुछ पैसे बचा लेता ताकि मैं किताबें खरीद सकूं। गांव-शहर की दूकानों पर, दिवालों पर या सड़क पर गिर किसी अखबार के टुकड़े पर, जहां कहीं भी मुझे कुछ पढ़ने को मिलता। मैं तुरंत उसे पढ़ता और उनके अर्थ समझने की कोशिश करता। इसी दौरान मैं कुछ ग़लत आदतों का शिकार भी हुआ परंतु ईश्वरीय कृपा से मैंने जल्द ही उनसे छुटकारा पा लिया। इसी प्रकार मैं 16 साल की उम्र तक इतना ज्ञान हासिल कर चुका था जितना की कुछ लोग सारी उम्र तक नहीं कर पाते। लेकिन जैसे-जैसे मेरा ज्ञान बढता गया। मेरी जिज्ञासा भी बढ़ती चली गई। अब मेरा मन सृष्टि के अनसुलझे सवालों की तरफ आकर्षित होने लगा।

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खैर इधर-उधर की किताबों से किताबी ज्ञान तो बहुत मिल चुका था लेकिन अभी भी मैं अपरिपक्व था क्योंकि जीवन का असली ज्ञान जिसे अनुभव कहते हैं, अभी बाकी था। मैंने किताबों में पढ़ा था कि जीवन का असली ज्ञान किताबों से नहीं बल्कि कठिन संघर्ष से मिलता है और सौभाग्यवश उसकी शुरुआत भी हो चुकी थी। एक दिन पापा का साईकिल स्टैंड वाला काम छुट गया और पापा फिर बेरोजगार हो गए। दरअसल पापा ने शुरू से ही सरकार नौकरी की थी इसलिए उन्हें दुसरा कोई काम भी नहीं आता था। वे कम पढ़े-लिखे पुराने ख्यालों वाले, कंफर्ट जोन में रहने वाले व्यक्ति थे। जो ये मानते हैं कि ईश्वर ने उनकी किस्मत में गरीबी ही लिखा है। शायद इसीलिए उन्होंने कभी कुछ सीखने की कोशिश ही नहीं की। बहरहाल हम घर पर बैठ गए और दुसरो की खेतों में मजदूरी करके किसी तरह दाल रोटी चलाने लगे। उन्हीं दिनों हमारे देश में क्रिकेट का बुखार धीरे-धीरे चढ़ रहा था। शहर में पढ़ाई के दौरान मैंने कुछ लड़कों को क्रिकेट खेलते देखा था और मेरे अंदर भी क्रिकेट नाम का जीवाणु था। इसलिए मुझे भी क्रिकेट का बुखार लग गया। उन दिनों मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर लोकप्रिय थे और मैं तो एकदम उनका दिवाना था। तब हर किसी के घर में टीवी नहीं था और हम भी रेडियो पर ही कमेंट्री सुनते थे। सचिन जब तक खेलते थे तब तक मेरे दिल की धड़कन रूकी रहती कि कहीं वे आउट ना हो जाएं। जब भी सचिन का चौका लगता मैं खुशी से नाचने लगता और उनके आउट होते ही रेडियो पटक देता। उस वक्त मेरे गांव में कोई क्रिकेट का क भी नहीं जानता था। मैंने गांव के कुछ लड़कों को क्रिकेट खेलना सिखाया और प्लास्टिक के गेंद से क्रिकेट खेलना आरंभ कर दिया। धीरे-धीरे क्रिकेट मेरा passion बन गया। सोते-जागते बस क्रिकेट ही क्रिकेट मेरी रगों में बहने लगा। मैं दाएं हाथ का आक्रामण बल्लेबाज था और अपनी टीम का कैप्टन भी था।मेरे अंदर देशभक्ति की जो भावना कुट-कुट कर भरी हुई है। वह क्रिकेट के प्रति दिवानगी का ही परिणाम है। परंतु जैसे-जैस ये दिवानगी भी बढ़ती जा रही थी वैसे-वैसे मेरे परिवार की आर्थिक हालत भी खराब होती जा रही थी। घर में मुझमें छोटी 3 बहने भी था। जो धीरे-धीरे शादी के योग्य होती जा रही थी।


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इसी के साथ मेरे साथ एक दुर्घटना और हुई कि मुझे गांव की ही एक लड़की खुबसूरत से प्यार हो गया। प्यार ये आजकल वाला प्यार नहीं, बिल्कुल सच्चा प्यार राधा और कृष्ण वाला। जिसने मुझे जीवन का असली मतलब समझा दिया। अचानक मुझे ये एहसास हुआ कि ये दुनिया तो बहुत खुबसूरत लगने लगी है। शायद मैंने आज तक दुनिया की खुबसूरती को करीब से देखा ही नहीं था। अब मेरे पास बस दो ही काम थे। क्रिकेट खेलना और उस लड़की को एक नजर देखने के बहाने ढूंढना। अब मेरे दिलो-दिमाग पर हर वक्त उसका ही नशा छाया रहता। यदि एक दिन भी वह नजर नहीं आती तो ऐसा लगता कि अब जान निकल जायेगी। लेकिन जैसे ही वह मेरे करीब आती, मेरे पसीने छूटने लगते,दिल जोर जोर से धड़कने लगता, जैसे वह निकल कर बाहर आ जाएगा। पहले मैं सिर्फ किताबों की प्रेम कहानियों में पढ़ता था कि प्यार में प्रेमी तारें गिन-गिन कर रातें बिताते हैं। लेकिन वे तारे क्यों गिनते हैं अब मुझे पता चल रहा था। अब तो रात भर करवटें बदलते हुए तारे गिनना मेरा रोज का काम था। उसकी प्यारी मुस्कुराहट, उसकी खनकती हुए हंसी मेरे दिल की गहराई में उतरने लगी। मैंने उसके लिए कई बार प्रेम पत्र लिखे लेकिन एक बार भी उसे दे नहीं पाया। हालांकि मैं काफी हिम्मतवाला था लेकिन उसके करीब जाते ही सारी हिम्मत धरी की धरी रह जाती। मेरे अंदर उसको खोने का डर काफी ज्यादा था शायद इसलिए मैं डरता था कि कहीं वह नाराज ना हो जाएं। क्योंकि मैं एक गरीब परिवार का लड़का था और वह एक अमीर परिवार की इकलौती लड़की थी। परंतु मैं किसी भी हाल में उसे खोना नहीं चाहता था। मैंने कई बार अपने नादान दिल को समझाने की कोशिश की लेकिन इस पागल दिल ने कब किसी की सुनी है जो मेरी सुनता। इसी प्रकार हमारी लुका-छिपी का खेल चलता रहा लेकिन मैं चाह कर भी उससे अपने दिल की बात ना कह सका। उन दिनों हमारे गांव और आसपास के क्षेत्रों मेंं कथा, अष्टयाम, महायज्ञ जैैसेे धार्मिक आयोजन खुुुब होते थे। उन आयोजनों में हम दोनों निश्चित रूप से जाते और सारी दुनिया को भूल कर एक दूसरेे की आंखों में खोए रहतेे। इधर मुझे पापा से रोज डांट मिलने लगी कि दिनभर क्रिकेट खेलने से पेट नहीं भरेगा। तुम कुछ काम धाम क्यों नहीं करते। इसके लिए कई पापा ने मेरा खाना तक बंद करवा दिया लेकिन जब पापा सो जाते तो मेरी मां मुझे किसी तरह मना कर खिला देती। ऐसा नहीं है कि मेरे पापा बुरे इंसान थे लेकिन उस वक्त घर के हालात ही ऐसे थे। आखिरकार एक दिन परेशान होकर मैंने …..

दोस्तों ये कहानी अभी बहुत लंबी है और मैं नहीं चाहता कि आप बोर हो जाएं इसलिए आज के लिए बस इतना ही...  

बाकी अगले भाग में...



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