जीवन क्या है और इस जीवन का सत्य क्या है?

jivan kya hai | jivan ka satya kya hai

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"इक छोटी सी जिंदगी का कुछ इस तरह फसाना है, कागज की कश्ती को समुंदर में बहाना है।" जी हां दोस्तों हमारा जिंदगी भी बिल्कुल कागज की कश्ती के माफिक है। जो संसार सागर में बही जा रही है। लेकिन भैतिक सुखों की खोज में हम अपने वास्तविक मार्ग से भटक गए हैं। इस स्वप्निल संसार की क्षणभंगुर सुखों की आकांक्षा ने हमें भ्रमित कर दिया है। अतः हम भूल गए हैं कि हमारा जीवन क्या है, इस जीवन का सत्य क्या है। इसलिए इस आर्टिकल में हम जीवन से जुड़े आपकेे सभी उलझनों को दूर करने का प्रयास करेंगे।


हमारा जीवन क्या है


दोस्तों हमलोग प्रतिदिन सुबह उठते हैं और सबसे पहले शौच-स्नान इत्यादि से निवृत्त होते हैं। उसके बाद नाश्ता करते हैं और फ़ौरन अपने ड्यूटी पर भागते हैं। वहां हम दिनभर अपना काम करते हैं और फिर शाम को वापस घर चले आते हैं। घर आकर हम थोड़ा आराम करते हैं तत्पश्चात डिनर करके सो जाते हैं। अगली सुबह हम फिर उठते हैं और पुनः उसी दिनचर्या को दोहराते हैं। खैर इसमें कुछ अनुचित नहीं है क्योंकि ये सारे क्रियाकलाप हमारे जीवन जीवन के आवश्यक अंग है परंतु क्या हम कभी थोड़ा ठहरकर सोचते हैं ये जीवन क्या है और हमें ये जीवन क्यों मिला है। शायद नहीं। क्योंकि हमारे पास ये सब सोचने के लिए समय ही नहीं है । परंतु जरा एक पल को सोचिए कि सारी उम्र भाग-दौड़ करने के बाद, सारी उम्र जी-तोड़ मेहनत करने के बाद यदि अंत में हमें पता चले कि आज भी हमारे हाथ खाली के खाली ही है तो हमारी हालत कैसी होगी। शायद हमारी हालत उस भिखारी के जैसी होगी। जो दिनभर भीख मांगने के बाद जब अपने घर जाता है तो उसकी झोली खाली की खाली मिलती है।
जी हां दोस्तों ये बात कड़वी जरूर है लेकिन सच्चाई है। हमारी जिंदगी भी बिल्कुल उसी भिखारी के जैसी है। यह बात हम क्यों कह रहे हैं। यह समझने के लिए आपको अपने समुचे जीवन पर एक बार गौर करना होगा। तो आइए जरा हम अपने जीवन के घटनाक्रमों पर एक नजर डालते हैं।



दोस्तों हम सब किसी ना किसी मां के गर्भ में जन्म लेते हैं। हमारे जन्म के बाद खुब मिठाईयां बांटी जाती है। खुब खुशियां मनायी जाती है। लेकिन ध्यान रहे वो खुशी इसलिए नहीं मनाई जाती कि हमें एक जीवन मिलता है। वो खुशी इस कारण मनाई जाती है कि हमारे परिवार के बोझ को कम करने वाला एक आदमी मिल जाता है। ‌इसलिए हमारे परिवार अथवा समाज में लड़की पैदा होने पर उतनी खुशी नहीं मनाई जाती। जितनी की एक लड़के के पैदा होने के बाद मनाई जाती है। क्योंकि आज भी हमारे समाज में लड़कियों को बोझ समझा जाता है।


खैर हम सुनहरे बचपन का आनंद लेते हुए धीरे-धीरे बड़े होने लगते हैं। बचपन के दिन हमें बड़े सुहावने लगते हैं‌ क्योंकि उस वक्त हमारे मन में कोई दुर्भावना, कोई विकार नहीं होता। लेकिन हमारे बचपन के खुशियों को ग्रहण तब लग जाता है जब हमें स्कूल नाम के जेल में भेज दिया जाता है। आजकल की स्कूलों को हम जेल इसलिए कहते हैं क्योंकि वहां हमे जीवन की वास्तविकता से जुड़ी बातें नहीं सिखाई जाती। वहां हमे सांसारिक वस्तुओं का गुलाम बनाया जाता है। वहां हमें मनुष्य बनना नहीं सिखाया जाता, वहां हमें केवल एटीएम मशीन बनाया जाता है। हमारे परिजन भी हमें स्कूल इसी उद्देश्य से भेजते हैं कि हम पढ़-लिखकर किसी उच्च पद को प्राप्त कर सकें और अधिक से अधिक धन कमा सकें।


बहरहाल जब तक हम स्कूल से निकलते हैं तब तक युवा हो चुके होते हैं। अतः हमारी शादी कर दी जाती है। शादी होने के बाद पत्नी घर आती है और उसके कुछ ही महीनों बाद बच्चे भी आ जाते हैं। अब हम मां बाप, बीबी-बच्चों की फरमाइशें तथा अपनी महत्वाकांक्षाओं को पूरा करने में जुट जाते हैं। फिर अधिक से अधिक धन इकट्ठा करना, बेहतर से बेहतर सुख के साधन जुटाना, ज्यादा से ज्यादा संभोग सुख प्राप्त करना और अपने अहंकार को पुष्ट करना हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य बन जाता है। और इसके लिए हम क्या नहीं करते, झुठ बोलते हैं, चोरी करते हैं, बेईमानी करते हैं, तरह-तरह के छल-प्रपंच रचते हैं और यहां तक की जरूरत पड़ने पर हम किसी की हत्या तक करने को तैयार हो जाते हैं। हम पाप पुण्य, उचित-अनुचित, न्याय-अन्याय, नैतिक-अनैतिक सब कुछ भुल जाते हैं। इन्हीं भोग विलासताओं के पीछे भागते-भागते हम जीवन के सबसे बड़े सच को भूल जाते हैं।


जीवन के प्रति हमारा भ्रम


हां हम मंदिर, मस्जिद, चर्चो और गुरुद्वारों में पुजा-पाठ करना नहीं भूलते। हम कभी-कभी दान-पुण्य, यज्ञ-अनुष्ठान, गंगा स्नान और तीर्थाटन भी करते हैं। अर्थात अपने पापों को छुपाने के लिए धार्मिक होने का ढोंग भी करते हैं। (कुछ अच्छे और सच्चे लोगों को छोड़कर अधिकांशतः लोग ढोंग ही करते हैं ) और यहीं सब करते करते हम कब बुढे हो जाते हैं, हमें पता भी नहीं चलता। हमें इस बात का पता तब चलता है,जब हमारा ही शरीर हमें धोखा देने लगता हैं। जब हमारे प्यारे बच्चे हमें ही अनदेेखा करने लगते है। और एक दिन जब अचानक मौत हमारे सामने आ कर खड़ी हो जाती है तो हमारे बीबी बच्चे दोस्त रिश्तेदार सब पराए लगने लगते हैं। तब हमें एहसास होता है कि जिंदगी भर भागे और कहीं ना पहुंचे। तब हमें एहसास होता है कि ‌जिंदगी भर मेहनत करने के बाद भी हमारे हाथ खाली के खाली ही है। उस वक्त हम सोचते हैं कि काश हमें एक और मौका मिल जाता और हम अपने अतीत में जाकर अपनी गलतियों को सुधार पाते। मगर अफसोस कि मौत हमें एक पल भी ज्यादा नहीं देती। उस वक्त हमारे मन में जो अफसोस होता है, जो दुख होता है, जो दर्द होता है। उसके आगे मौत की दर्द भी फीका पड़ जाता है। दरअसल मौत का दर्द तो सिर्फ़ लोगों को डराने के लिए होता है। असली दर्द तो हमारे जीवन का अधूरापन ही देता है। सबसे ज्यादा कष्ट तो हमारे अतीत के बूरे कर्म ही देते हैं। और यहीं दर्द शायद हमारे जीवन की कहानी का दुखद: अंत भी होता है।


दोस्तों हमने ये सारी बातें आपके अंदर निगेटिविटी फैलाने के लिए नहीं कहीं है। और ना ही हमारे कहने का ये अर्थ है कि आप अपना काम धाम, घर परिवार छोड़ कर जंगल चले जाओ। सृष्टि के भैतिक नियम के अनुसार अपने तन को स्वस्थ रखने के लिए आवश्यक साधन जुटाना मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार है। हम स्वयं भी अपनी कर्तव्यों और बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए आवश्यक कर्म करते हैं। हम भी जीवन को सहज और सुगम बनाने के लिए उचित प्रबंध करते हैं परन्तु हम हर पल जागरूक और सजग होकर जीवन के सच को जानने का प्रयास करते रहते हैं। और हमने आपको भी वहीं सच्चाई बताई है जो हमने अनुभव किया है, जो हमने महसूस किया है। हालांकि आपकी तरह हम भी बरसों से सोएं हुए थे परन्तु अब हम जाग गए हैं और हम चाहते हैं कि आप भी जागो और स्वयं को पहचानों। आप केवल शरीर नहीं है आप एक आत्मा है। और आप जिन भोग-विलासताओं को जीवन समझ रहे हैं, वास्तव में वह जीवन नहीं है। क्योंकि केवल जन्म-मरण और खाना कमाना तो जीवन नहीं हो सकता। आपका जीवन का इन सभी चीज़ों से कहीं श्रेष्ठ है। क्योंकि ईश्वर ने सृष्टि का इतना विशाल आयोजन इतने छोटे उद्देश्य के लिए तो नहीं किया होगा। इसलिए इतना तो तय है कि जीवन एक अत्यंत अर्थपूर्ण रचना है।

जीवन क्या है?


इस प्रश्न की अलग-अलग लोगों ने अलग तरह से व्याख्या की है। संक्षेप में कहें तो कोई कहता है कि जीवन एक अनंत यात्रा है। कोई कहता है कि जीवन एक संघर्ष है। कोई कहता है कि जीवन एक अथाह सागर हैं। जैसे- मेरे सोच के अनुसार जीवन एक बीज है। जो पंचतत्वों से बने भिन्न-भिन्न आकारों में अंकुरित होता है। विभिन्न आकारों क्या अर्थ है - मनुष्य शरीर, जीव-जंतु, पेड़-पौधे, कीड़े-मकोड़े इत्यादि। और एक निश्चित अवधि के बाद जब हमारा शरीर जर्जर हो जाता है यानी जब आकार उस बीज को थामे रखने में समर्थ नहीं होता तो वह बीज उस आकार से निकलकर दूसरे आकार को धारण कर लेता है। और मेरे अनुभव से वह जो बीज यानी आत्मा हमारे अंदर होता है वह परमात्मा का ही अस्तित्व है। परंतु मेरा मानना है कि ये सभी उत्तर केवल कोरी कल्पनाओं पर आधारित है। जिसका कोई प्रमाणिक आधार नहीं है। इसलिए हम कहते है कि आप मेरी या किसी की बात पर विश्वास मत करो। क्योंकि जब आप किसी की सही या ग़लत बात पर विश्वास कर लेते हो तो आपकी जिज्ञासा शांत हो जाती है, जो खोज शुरू हो सकती थी वह बंद हो जाती है। और आप वास्तविकता को जानने से वंचित रह जाते हैं।


जीवन क्या है कोई न जाने



ईमानदारी से कहें तो हम भी जीवन के इस रहस्य को नहीं जानते। हालांकि हम भी अपने अनुभव के आधार पर लम्बे-लम्बे व्याख्यान ही दे सकते हैं। मगर यह तो वही बात हुई कि फल खाए कोई और हम फल के स्वाद का वर्णन करें। जीवन के इस रहस्य को बुद्ध, महावीर, कबीर, लाओत्से, मंसूर और ओशो जैसे कुछ गिने-चुने लोग ही जान पाएं है। और‌ वास्तव वे लोग ही जीवन को पूर्णतया जान सके है। वैसे हम भी जीवन के इस रहस्य को जानने का प्रयत्न कर रहे हैं और अभी तक इतना तो जान लिया है कि जीवन अभी और यहीं आपके भीतर उपलब्ध है। अतः इसे बाहर खोजना व्यर्थ है। इसे तो केवल जानना है। हमें समझ आ गया है कि जीवन संसारिक भोग-विलास के पीछे भागने में नहीं है वरन् साक्षी भाव में है। अपने भीतर शुन्य हो जाने में है। जीवन तो स्वयं को जान लेने में है, जो आप है। इसलिए हम स्वयं को भीतर से जानने का प्रयास कर रहें हैं और आपसे भी कहते हैं आज और अभी से होशपूर्वक जीना शुरू करों। आप अपनी दिनचर्या से थोड़ा समय निकाल कर अपने  भीतर उतरो और अपने भीतर मौजूद जीवन को जानने का प्रयत्न करों। क्योंकि इस प्रश्न का उत्तर आपको और कोई नहीं दे सकता इसे तो आपको स्वयं ही खोजना होगा। हम भी इस दिशा में आगे बढ़ रहें हैं और हमें जो भी अनुभव होगा। हम आपको बताते रहेंगे। धन्यवाद 🙏

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