मेरे जीवन के कठिन संघर्ष से सफलता तक की सच्ची कहानी

Motivational story in hindi for success|real life inspirational story in hindi

motivational story in hindi, real life inspirational story in hindi
                     My real life story

दोस्तों मेरी आत्मकथा के पहले भाग में अपने पढ़ा कि मेरा जन्म एक गांव के अत्यंत गरीब परिवार में पैदा हुआ था। मेरा बचपन एक ऐसे माहौल में गुजरा था। जहां रात दिन परिवारिक कलह और लड़ाई झगड़े हुआ करते थे। गरीबी की वजह से मुझे 14 साल की उम्र में ही पढ़ाई छोड़कर परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ी। गरीबी के उस आलम में मेरे साथ समय की एक और विडम्बना यह हुई कि मुझे बचपन में ही एक लड़की से सच्ची मोहब्बत हो गई। एक तरफ गरीबी का दर्द और दुसरी तरफ मोहब्बत के अनचाहा दर्द ने मेरे दिलो-दिमाग को दुःख और तनाव से भर दिया। परेशान होकर मैंने एक कठोर निर्णय ले लिया। अब आगे पढ़िए..

मेरी आत्मकथा- भाग 1 


मेरी आत्मकथा- भाग 2

खिरकार अपनी गरीबी और मजबूरी से व्यथित होकर मैंने घर छोड़ने का निश्चय कर लिया। मगर अब समस्या यह थी कि जाए तो जाए कहां। क्योंकि मैंने जब से होश संभाला था तब से अपने ख्वाबों की दुनिया से बाहर कदम भी नहीं रखा था। तभी मेरी मुलाकात गांव के ही एक व्यक्ति से हुई। जो दिल्ली में रहकर राजमिस्त्री का काम करता था और संयोगवश वह उसी दिन दिल्ली जाने वाला था। बस फिर क्या था। मैंने एक झोले में अपने कुछ नये-पुराने कपड़े ठूंसे और बिना किसी को कुछ बताए उसके साथ निकल पड़ा। शायद उस व्यक्ति को भी किसी हेल्पर की तलाश थी शायद इसलिए उसने मेरा किराया भाड़ा भी देना स्वीकार कर लिया था। स्टेशन पहुंचकर उसने हम दोनों का टिकट कटाया और दिल्ली जाने वाली सत्याग्रह एक्सप्रेस में बैठ गए। करीब 22 घंटों के सफर के बाद हम दिल्ली पहुंच चुके थे।


दिलवालों का शहर दिल्ली मेरी आंखों के लिए एक अनोखा अनुभव था। ऊंची ऊंची इमारतें, साफ-सुथरे पक्के रोड, फ्लाईओवर्स, चमकती-दमकती गाड़ियों की लंबी कतारें, सचमुच दिल को तरंगित करने वाली थी परंतु मेरा दिल तो मेरे पास था ही नहीं उसे तो मैं गांव में छोड़ आया था। वहां जाकर मुझे पता चला कि ख्वाबों की दुनिया में और हकीकत की दुनिया में कितना ज्यादा फर्क होता है। मुझे आज भी अच्छी तरह याद है, जब मैं वहां सीमेंट की खाली बोरियों के बिस्तर पर ईट को तकिया बना कर सोता था। क्योंकि मैं अपने साथ कोई भी ओढ़ना-बिछौना इत्यादि नहीं ले गया था। हालांकि मैं जिसके साथ गया था, उसके पास वहां पहले से भी बिस्तर इत्यादि मौजूद था। लेकिन वह उस पर अकेला ही सोता था। बहरहाल मैंने वहां पर पूरे मेहनत और लगन से काम करना शुरू कर दिया। उस समय वहां एक मजदूर की दिहाड़ी मात्र ₹70 थी। लेकिन उस समय मेरे लिए उतना ही काफी था। मैं वहां दिन भर काम करता और रात भर अपने बिछड़े मोहब्बत की जुदाई में तड़पता रहता। धीरे-धीरे कुछ दिन बीते अब मुझे वहां काम करते हुए करीब 20 दिन हो गए थे। तभी दिवाली करीब आ गई। उसी दिवाली के दिन दिल्ली में सीरियल बम ब्लास्ट हुए थे। जिस वक्त ब्लास्ट हुआ था, उस वक्त मैं घटनास्थल से महज 3 किलोमीटर की दूरी पर एक निर्माणाधीन इमारत की पांचवी मंजिल पर सोया हुआ था। अगले दिन जब न्यूज के द्वारा बम धमाकों की खबर हमारे गांव तक पहुंची तो हमारे घर वाले काफी घबरा गए। मैंने STD से कॉल करके अपने घरवालों से बात की और उन्हें आश्वस्त किया कि हमलोग बिल्कुल ठीक है। किंतु मां मेरे घर वापसी की जिद करने लगी और वैसे भी छठ पर्व नजदीक था इसीलिए मुझे घर वापस आना पड़ा।


घर आकर फिर वही पुरानी दिनचर्या शुरू हो गई। एक बार फिर से चांद और चकोर की दुनिया रौनक हो गई। धीरे-धीरे दिन दिन बीतने लगे। एक दिन सुबह बाबूजी मुझे बुलाकर बोले- तुम अपना सारा कपड़ा-लत्ता पैक कर लो, गाड़ी पर जाना है। जाने की बात सुनकर मैं तो बिल्कुल हक्का-बक्का रह गया। कहां किस गाड़ी पर जाना है, मैंने हैरान होते हुए पूछा। ट्रक पर जाना है ड्राइविंग सीखने के लिए, मेरी जान पहचान का एक ड्राइवर है। मैंने उससे बात कर ली है। नहीं मुझे ड्राइवरी नहीं सीखनी मुझे क्रिकेट खिलाड़ी बनना है। मैंने थोड़ा डरते-डरते कहा। बेटा क्रिकेट खेलने से पेट नहीं भरता और ड्राइविंग बिल्कुल आराम वाला काम है। उसमें ज्यादा मेहनत भी नहीं है और कमाई भी बहुत है। बाबू जी ने थोड़ा नरमी दिखाते हुए कहा। बबुआ, घर की स्थिति तो तुम देख ही रहे हो कि कितनी खराब हालत है। मां की ममता हालातों के आगे बेबस थी। मां की बात सुनकर मैं थोड़ा सोचने लगा। अच्छा और घर कितने दिन पर आना है। थोड़ी देर सोचने के पश्चात मैंने दुबारा प्रश्न किया। बस यहीं पास के कस्बे की गाड़ी है। तुम चाहो तो दो-चार दिन के अंतराल पर आ-जा सकते हो। मैंने सोचा इतनी दूर दिल्ली में रहने से यहीं अच्छा है। यहां पास भी रहेंगे और दो-चार दिनों पर महबूब की झलक भी मिलती रहेगी। "तो फिर ठीक है," मैंने कहा और तैयार होने चला गया। थोड़ी देर में तैयार होकर मैं उसकी गली में आ गया। जाने से पहले मैं उसे आंखें भर के देख लेना चाहता था लेकिन वह कहीं दिखाई नहीं पड़ी। परेशान होकर मैंने उसकी गली के दो-चार चक्कर लगा लिए लेकिन पता नहीं वह कहां छुप कर बैठी हुई थी। इधर बाबूजी साइकिल पर बैठे-बैठे नाराज हो रहे थे। आखिरकार निराश होकर मैंने डबडबाई आंखों से झोला उठाया और साइकिल के कैरियर पर जाकर बैठ गया। बाबूजी धीरे धीरे पैडल मारने लगे। इधर जैसे-जैसे मैं गांव से दूर होता जा रहा था। वैसे-वैसे मेरे जिस्म से प्राण निकलते जा रहे थे।



थोड़ी देर चलने के बाद हम लोग कस्बे में पहुंच गए। बाबू जी मुझे ड्राइवर के पास ले गए और मुझसे बोले- यही तुम्हारे उस्ताद हैं इन्हें प्रणाम करो। मैंने तुरंत बाबूजी की आज्ञा का पालन किया। बाबू जी ने थोड़ी देर इधर-उधर बातें की और चलते-चलते उनको हिदायत दी। मेरा लड़का अब आपके हवाले है, इसका ठीक से ख्याल रखना और ड्राइवरी भी सिखाते रहना। यह कह कर चले गए। उस वक्त गाड़ी शायद लोड हो चुकी थी और चलने की तैयार थी। उस्ताद के कहने पर मैं क्लिनर की जगह पर बैठा और गाड़ी चल पड़ी। कुछ दूर चलने के बाद उस्ताद ने गाड़ी में लगा ऑडियो प्लेयर ऑन कर दिया। " चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना, भूल जा तू वो मस्त हवा वो झूलना डाली डाली,जग की आंख का कांटा बन गई चाल तेरी मतवाली, कौन भला उसे बाग को पुछे हो ना जिसका माली, तेरी किस्मत में लिखा है जीते जी मर जाना। चल उड़ जा रे पंछी कि अब ये देश हुआ बेगाना। इस गाने को सुनते ही मेरे अंदर भावनाओं का तूफान उमड़ पड़ा। मैंने तुरंत ही अपना सिर गाड़ी की खिड़की से बाहर निकाल लिया क्योंकि मेरी आंखों से आंसू की बरसात होने लगी थी। वो खेत-खलिहानों में दौड़ना, बचपन के दोस्तों के साथ बाग-बगीचों में खेलना, मेरे दिलरुबा की वों प्यारी मुस्कान, मेरी मां की वो निस्वार्थ ममता, सब मेरे दिमाग में किसी फिल्म की भांति चल रहे थी। और आंसू थे कि रुकने का नाम ही नहीं ले रहे थे। समझ में नहीं आता कि उन दिल के एहसासों को किस तरह बयान करूं दोस्तों। आप बस इसी से समझ लो कि 25 किलोमीटर के सफर मैंने आंसुओं से लकीर खींच दी। जिंदगी में कभी कभी ऐसा भी वक्त आता है जहां इंसान को वक्त के साथ समझौता करना ही पड़ता है। मैं भी वक्त के साथ समझौता करने की कोशिश में लग गया। चूंकि अब मैं प्रतिदिन नई-नई जगहों पर जाने लगा, नए-नए लोगों से मिलने लगा तो दिल का दर्द थोड़ा हल्का हुआ। लेकिन पहले प्यार का दर्द कभी कोई भूल सकता है क्या। मैं जहां भी जाता उसकी यादें साथ साथ जाती थी। मन को बहलाने देने के लिए मैं पागलों की तरह कभी हाथों पर तो कभी वृक्षों पर कुरेद-कुरेद कर उसका नाम लिखता रहता। और मैं कर भी क्या सकता था। मेरे उस्ताद ठीक-ठाक आदमी थे। वे मेरे खाने-पीने का ख्याल रखते थे। मगर उनको बस मेरे एक ही बात से हरज थी कि मै रोज शाम को घर चला जाता था। हालांकि मैं छुट्टी नहीं करता था बल्कि ट्रक मालिक के घर गाड़ी लगने के बाद रात को घर चला आता और फिर सुबह गाड़ी पर वापस आ जाता। जबकि मेरे उस्ताद चाहते थे कि मैं कम से कम 1 हफ्ते के अंतराल पर घर जाऊं जो कि मेरे लिए संभव नहीं था। एक दिन उन्होंने मुझे सख्त हिदायत दे डाली कि गाड़ी पर रहना है तो ऐसे आना जाना नहीं चलेगा। अब मैं भी ठहरा मनमौजी आदमी, मैंने कहां कभी किसी का रोब बर्दाश्त किया था। मैंने भी साफ-साफ ज़वाब देकर घर वापस आ गया उसके बाद कई बार उसने बाबूजी से खबर भिजवाई। लेकिन अब मैं कहां जाने वाला था।




धीरे-धीरे मेरा प्यार और भी गहरा होता गया। अब तो मैं उसके प्यार में बिल्कुल पागल हो चुका था। लेकिन पता नहीं उस वक्त मैं कितना कायर और डरपोक था कि लाख कोशिशों के बावजूद अपने प्यार का इजहार नहीं कर पाया था। शायद मैं डरता था कि कहीं उसने मुझे गलत समझ लिया तो मुझे नफरत करने लगेगी। कभी-कभी तो मुझे लगता कि मैं एक तरफा प्यार की आग में जल रहा हूं। मगर क्या करता मैं दिल के हाथों मजबूर था और मेरे दिल की हालत समझने वाला कोई ना था। जो दोस्त भी थे उन्होंने भी कभी मेरी मदद करने की कोशिश नहीं की। वे कमीने तो मेरे साथ ही रहकर मेरे ही प्यार पर लाइन मारते। कभी-कभी तो दिल करता इन लोगों की दोस्ती से छुटकारा पा लूं मगर चाह कर भी ऐसा नहीं कर पाता। शायद मुझे अब सब कुछ सहने की आदत हो चुकी थी। मेरी भाभी, मेरी बहनें, मेरे प्यार के बारे में सब-कुछ जानती थी। लेकिन इनमें से कोई भी मेरे सच्चे प्यार को समझने वाला नहीं था। इधर गरीबी के काले घने बादल मेरे परिवार को घेरे ही जा रही थी। मेरे बाबूजी जो शायद गरीबी के आगे हार मान चुके थे, बस किसी तरह से परिवार को जिंदा रखे हुए थे। मेरे मां-बाप छोटे-छोटे भाई बहनों की सारी उम्मीदें, सारी अपेक्षाएं मेरे साथ जुड़ी हुई थी। कहते हैं कि जब गरीबी दरवाजे से दस्तक देती है ना तो मोहब्बत खिड़की से बाहर निकल जाती है। मेरे साथ भी यही हुआ मैंने फिर से फैसला कर लिया कि अपने परिवार को गरीबी में नहीं मरने दूंगा।



उसी समय गांव के करीब 20-25 लोग जिसमें बड़े भैया भी शामिल थे, लुधियाना किसी फैक्ट्री में काम करने जा रहे थे। गांव का ही एक ठेकेदार उन्हें अपने खर्चे पर ले जा रहा था। बस क्या था मैं भी उनके साथ हो लिया। लुधियाना जाने से एक दिन पहले मैंने एक कागज पर उसके प्रति अपने दिल के जज़्बातों को एक कागज पर उतारा और अपने छोटी बहन (जो उसकी सहेली थी) को दे दिया। मैंने उससे कहा कि मेरे जाने के बाद उसको दे देना।
करीब दो दिनों के सफर के बाद हम लोग तीसरे दिन शाम को लुधियाना स्थित कारखाने में पहुंच गए। वहां पहुंच कर सभी ने रात में कारखाने के भंडारे में भोजन किया और आराम करने लगे। इसी दौरान वहां पहले से काम कर रहे मजदूरों से बात होने लगी। मजदूर वहां की स्थिति के बारे में काफी नकारात्मक बातें कर रहे थे। वे कह रहे थे कि हम लोग तो यहां पहले से ही फंसे हुए हैं, आप लोग कहां से फंसने के लिए आ गए। यहां बहुत काम कराया जाता है, मजदुरी भी न्यूनतम दिया जाता है और किसी को घर भी नहीं जाने दिया जाता। आप लोग किसी प्रकार से यहां से निकल जाओ। अब तो सभी लोगों के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगी। अब सभी लोग वहां से बाहर निकलने की योजना बनाने लगे। हालांकि मैंने उन्हें समझाने की कोशिश कि "हमें कुछ दिन यहां काम करके देख लेना चाहिए कि कैसा काम है और क्या पैसा मिलता है, हो सकता है कि ये मजदूर हमें भड़का रहे हो।" लेकिन भैया ने मुझे डांटकर चुप करा दिया।अगली सुबह सभी लोग कुछ ना कुछ बहाना बनाकर अलग-अलग गेटों से बाहर निकल गए।



मैं भी अपने भैया के साथ वहां से निकल गया। फिर वहां से हम लोग दिल्ली आ गए जहां गांव के और लोग पहले से ही काम कर रहे थे। वहां पर हम लोगों ने काम की तलाश शुरू कर दी किंतु कहीं भी भैया के मन मुताबिक काम नहीं मिल पाया। तभी एक दिन हमें पता लगा कि गुड़गांव में काम मिल रहा है। अगले दिन हम लोग गुड़गांव के लिए रवाना हो गए। वहां रात को हम दोनों भाइयों ने खाना खाया और सो गए। सुबह हम लोगों को मकान वॉल पुट्टी का काम मिल गया। और अंततः हम लोग बतौर हेल्पर काम करने लगे। अभी काम मिले 2-3 दिन भी नहीं हुए थे। एक दिन हमें बताया गया कि आप लोग वापस चलें जाओ यहां अब काम नहीं है। शायद वहां मजदूरों की संख्या ज्यादा हो गई थी। फिर हमने अपना हिसाब-किताब किया और निराश होकर वहां से वापस दिल्ली के लिए ऑटो पकड़ ली। अगले ही पल ऑटो अपनी रफ्तार से भागने लगी और मैं आंखें बंद करके अपनी बदकिस्मती के बारे में सोच रहा था। तभी एक मोड़ पर ड्राइवर ने अपना नियंत्रण खो दिया और ऑटो एक झटके से पलट गई। अगले ही पल मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया। मैंने पलटे हुए ऑटो से निकलने की कोशिश की लेकिन…


बाकी अगले भाग में
दोस्तों कहानी के इस भाग में आपको क्या सीखने को मिला कृपया नीचे कमेंट करके जरूर बताएं।‌और यदि अच्छा लगे तो इस कहानी को अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें। और हां
हमारे साथ जुड़े रहने के लिए हमें हमारे Facebook page, और Instagram पर जरूर फॉलो करें। आप हमारे YouTube channel पर जाकर हमारा motivational videos भी देख सकते हैं। धन्यवाद

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ