लाॅकडाउन में गरीब अप्रवासी मजदूरों की ये दर्द भरी कहानी आपको रूला देगी

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कोरोना महामारी के चलते लाॅकडाउन लगने से हमारा जनजीवन बूरी तरह से प्रभावित हुआ है। इस महामारी के कारण हम सभी को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा हैं। परंतु इस महामारी का सबसे बूरा असर पड़ा है, गरीब अप्रवासी मजदूरों पर। जो बिहार, बंगाल और झारखंड जैसे गरीब राज्यों से दो पैसे कमाने के लिए दिल्ली, मुंबई जैसेे महानगरों में जाते हैं। इस कहानी में हमने उन्हीं गरीब अप्रवासी मजदूरों के दर्द को बयां करने की कोशिश की है। आशा करता हूं ये hindi sad story आपके दिल को जरूर छुयेगी।

 

अनचाहा सफर 

"का भईल रे किशनवा आजो टिकट मिलल कि ना?" किशन ने जैसे ही कमरे में प्रवेश किया उसे बाथरूम में कपड़े धोते बिरजू चाचा की आवाज सुनाई पड़ी। किशन ने चेहरे से मास्क उतारा और बिना कोई जवाब दिए पंखे के नीचे बैठकर पसीना सुखाने लगा। गर्मी और भुख से उसका बूरा हाल था। श्याम और विनय जो दिवाल से टेक लगाए मोबाइल पर फिल्म देखने में व्यस्त थे। कान से ईयर फोन निकालकर सीधे हो गये। तब तक बिरजू भी हाथ पैर धो कर उसके पास आकर बैठ चुका था। "पहले कुछ खाना-वाना खिलाओ बहुत जोर से भूख लगी है।" किशन ने अपने छोटे भाई विनय की ओर देखते हुए कहा और साबुन उठाकर हाथ मुंह धोने वॉशरूम चला गया। जब तक वह हाथ मुंह धो कर आता, विनय एक थाली में खाना निकाल चुका था। थाली में फिर आलू और सोयाबीन की सब्जी देखकर किशन एक पल के लिए रुका और फिर चुपचाप भोजन करने लगा। पिछले 3 दिनों से आलू और सोयाबीन की सब्जी के खाते-खाते वह बिल्कुल उब चुका था। लेकिन उनके पास और कोई चारा भी ना था क्योंकि सब्जी वाले का ₹400 उधार हो चुका था और अब उसने उधारी देने से इनकार कर दिया था। "क्या हुआ ठेकेदार के पास गए थे कि नहीं?"
वह खाना खाकर उठते हुए बोला। "हां भैया ठेकेदार के रूम पर गया तो था लेकिन उसके रूम पर तो ताला लगा हुआ है। मैंने उसके मोबाइल पर कई बार कॉल किया लेकिन वह कॉल नहीं उठा रहा है।? विनय एक सांस में सारी बात बोल गया। किशन ने अपने मोबाइल से भी कई बार ठेकेदार का नंबर मिलाया मगर उसका मोबाइल स्विच ऑफ बता रहा था। "एक बार मिल जाए तब बताता हूं साले को!" वह गुस्से में बुदबुदाया। "आ टिकट के का भईल आजो मिलल ह कि ना?" बिरजू चाचा ने उसकी आंखों में झांकते हुए अपना सवाल दोहराया। "टिकट त आजो ना मीलल ह लेकिन एगो आदमी मिलल रहे जवन बतावत रहे की उ टिकट दिला दी।" किशन ने अपने गवई भाषा में जवाब दिया। वैसे तो वह सबसे हिंदी में ही बात करता था लेकिन बिरजू चाचा के साथ वह भोजपुरी में ही बात करता था क्योंकि उन्हें हिंदी नहीं आती थी। "त लेल काहे ना? बिरजू चाचा के मन में एक उम्मीद जगी। "कहां से लेतीं उ एक टिकट के ₹2000 मांगत रहे अउर हमरे पास तो कुल जमा ₹2000 रहे बाकी के ₹4000 कहां से लइती।" किशन की आवाज में बेबसी झलक रही थी।


किशन पिछले 4 दिनों से सुबह उठकर आनंद विहार रेलवे स्टेशन पर जाकर लाइन में लगता और दोपहर होते-होते खाली हाथ वापस आ जाता। हांलांकि उसने अपने स्मार्टफोन से तीन बार ऑनलाइन वेटिंग टिकट लिया था लेकिन तीनों बार टिकट कंफर्म नहीं हुआ। इस तरह ₹600 के टिकट के लिए अभी तक उसके लगभग ₹1000 बर्बाद हो चुके थे। दरअसल लाॅकडाउन की वजह से इतने लोग बिहार भाग रहे थे कि काफी पहले ही सारी टिकटें बुक हो चुकी थी। "तो फिर कैसे होगा भैया हम लोग घर कैसे जाएंगे?" श्याम जो अब तक चुप था लगभग रोते हुए बोला। "चिंता मत करो, कल तक कोई ना कोई उपाय हो जाएगा।" किशन अभी केवल दिलासा ही दे सकता था। "लेकिन भैया कल तक हम लोग खाएंगे क्या! राशन तो बिल्कुल खत्म हो गया है और हम लोग जिस दुकान से राशन उधार लाते थे उसे कोरोना हो गया है।" विनय ने एक नई समस्या सुनाई।
"तुम्हें कैसे पता?" किशन के लिए यह एक नई मुसीबत थी। सुबह जब मैं राशन लेने गया तो देखा कि पुलिस ने उसके घर को सील कर दिया था। जब मैंने आसपास के लोगों से पूछा तो उन्होंने बताया कि उसके घर में तीन लोगों कोरोना हो गया है।" विनय ने सारा वाक्या कह सुनाया। "ठीक है तुम लोग उधर मत जाना। मैं थोड़ा आराम कर लूं तो कोई इंतजाम करता हूं।" उन्हें हिदायत दे कर वह फर्श पर बिछे दरी पर लेट गया। बिरजू चाचा भी उसके पास ही लेट गए‌ और आंखें बंद करके जबरदस्ती सोने की कोशिश करने लगे। श्याम और विनय उनके पास ही कान में ईयर फोन लगाकर मोबाइल पर यूट्यूब वीडियो देखने लगे। "केतना मजा रहे गांव में, भईस के चरे के बेला द अउर पेड़ के ठंडा छांव में बइठ के गपशप करत रहऽ। इहां बेकार में आके फंस गईनी।" उन्हें बार-बार अपने गांव की याद आ रही थी। 


बिरजू, किशन, श्याम और विनय चारों बिहार के बेतिया जिले के एक छोटे से गांव के रहने वाले थे।वे चारो दिल्ली के शाहीन बाग इलाके में रहकर मजदूरी किया करते थे। किशन और श्याम राज मिस्त्री का काम करते थे और बिरजू और विनय लेबर का काम करते थे। बिरजू रिश्ते में किशन का चाचा लगता था और विजय उसका छोटा भाई था। जो पांचवी क्लास तक पढ़ने के बाद भाई के साथ दिल्ली भाग आया था। हालांकि किशन उसे दिल्ली लाना नहीं चाहता था। उसका बचपन से ही सपना था कि उसका छोटा भाई पढ़ ले कर कोई बड़ा आदमी बने। परंतु बहन की शादी में लिए गए कर्ज का ब्याज बढ़ता ही जा रहा था। जो थोड़े-बहुत खेत थे वे भी गिरवे रखे हुए थे। ऐसे में चावल और गेहूं भी भी खरीद कर ही खाना था। बाबूजी बुढ़े हो चुके थे और मां की तबीयत भी अक्सर खराब ही रहती थी। परिवार में अकेला किशन ही कमानेवाला था। ऐसे में आमदनी अट्ठानी और खर्चा रुपैया होने के कारण घर की आर्थिक स्थिति भी खराब होती जा रही थी।‌ इतनी महंगाई में एक आदमी के लिए परिवार का खर्च चलाना कोई आसान काम था। इसलिए चाहते हुए भी वह विनय को मना नहीं कर सका। विनय भी भाई की मजबूरी समझता था इसीलिए अब वह पढ़ने का इरादा छोड़ चुका था। श्याम अपने गरीब मां-बाप इकलौता का बेटा था और उसका था और वह विनय के साथ ही पढ़ता था। उसके बाबूजी और माई दोनों दूसरों के खेतों में काम करके घर चलाते थे। विनय जब आया तो श्याम भी उसके साथ ही दिल्ली भाग आया।


बिरजू चाचा की कोई संतान न थी और पत्नी भी लम्बी बिमारी के बाद स्वर्ग सिधार चुकी थी। उनके पास संपत्ति के नाम पर एक भैंस थी। जिसका दुध बेच कर वे अपना गुजर-बसर करते थे। किशन से उनकी खूब पटती थी। चाचा एक बेर दिल्ली घुम ल,जिनगी सवारत हो जाई। वह त्यौहार में जब भी गांव जाता, दिल्ली की खूब बड़ाई करता। बिरजू चाचा जिंदगी में कभी अपने जिले से बाहर नहीं गए थे लेकिन अबकी बार उन्होंने भैंस को पोशांव दिया और दिल्ली घुमने चले आए। इस प्रकार चारों एक दूसरे का सुख-दुख बांटने हुए एक साथ ही काम करते और रहते थे। जिंदगी में शिकायतें तो बहुत थी लेकिन फिर भी वे खुश थे। आखिर एक गरीब आदमी जिंदगी से और क्या अपेक्षा कर सकता है। जिंदगी चल रही थी यह भी कोई कम ना था। लेकिन अब कोरोना महामारी के आने से उनकी जिंदगी रुक सी गई थी। कोरोनावायरस के बढ़ते मामलों को रोकने के लिए सरकार ने देशव्यापी लॉकडाउन का ऐलान कर दिया था। काम धंधे सब बंद हो गए। इमरजेंसी सेवाओं को छोड़कर बाकी सारी सेवाएं बंद कर दी गई। एकाएक लाॅकडाउन की घोषणा से अप्रवासी मजदूर घबरा गए और सब अपने अपने घरों को लौटने लगे। परंतु कोरोनावायरस के बढ़ते संक्रमण को रोकने के लिए कुछ ट्रेनों को छोड़कर बाकी सारी ट्रेनें रद्द कर दी गई जिससे कारण रेलवे स्टेशनों पर भीड़ बढ़ने लगी। लेकिन अब अप्रवासी मजदूरों के लिए बस एक उद्देश्य रह गया किसी प्रकार अपने घर पहुंचना।
किशन और उसके बाकी साथियों का भी यही हाल था। काम बंद होने से उनको अपना खर्चा चलाना भी मुश्किल हो रहा था। उनके पास पैसे भी खत्म हो गए थे। उधर ठेकेदार था कि 4 दिनों से दिखाई नहीं दिया था और ना फोन ही उठा रहा था। शायद वह भी अपने गांव भाग चुका था।

शाम को किसान जब सो कर उठा तो 5:00 बज रहे थे। बिरजू चाचा अभी भी सोए हुए थे। श्याम और विनय कमरे के साथ बने छोटे से डबरेनुमा किचन में बर्तन मांज रहे थे। उन्हें बर्तन मांजने देखकर अचानक उसे ख्याल आया कि राशन लेने जाना है। वह जम्हाई लेते हुए उठा और बाथरूम में चला गया। नहा-धोकर वह बाहर निकला और कपड़े पहनने लगा। "किशन भैया अब हम घर कैसे जाएंगे।" श्याम लगभग भागता हुआ आया।
"क्यों क्या हुआ?" किशन ने शर्ट के बटन लगाते हुए पूछा। जवाब में श्याम ने मोबाइल स्क्रीन उसकी आंखों के सामने सामने कर दी। कोरोना के बढ़ते मामलों को देखते हुए रेलवे ने 245 ट्रेनों को अगले आदेश तक अस्थाई रूप से रद्द कर दिया है। मोबाइल स्क्रीन पर न्यूज़ शो हो रहा था।
"अब क्या होगा!" उसने मोबाइल श्याम को वापस किया और सोच में पड़ गया। कुछ देर सोचने के बाद उसने मोबाइल निकाला और रंजीत का नंबर डायल किया। रंजीत उसके बचपन का दोस्त था। वह जामिया नगर में प्लंबर का काम करता था। रंजीत ने कॉल रिसीव किया तो किशन सारी बात बताई और पूछा कि अब क्या किया जाए। "मैं तो कहता हूं कि कल पैदल ही निकल चलें नहीं तो एक-दो दिन के बाद रूम से बाहर निकलना भी कठिन हो जाएगा।" रंजीत ने सुझाव दिया। "पागल हो गए हो क्या! 1000 किलोमीटर पैदल चलना हंसी-मजाक है क्या।" किसान को उसकी बात पर हंसी आ गई। "तो क्या यहां भूखे प्यासे मरोगे! अरे किसी तरह थकते-रूकते गांव पहुंच ही जायेंगे लेकिन यहां तो भूखे मर जाएंगे। और वैसे भी हम लोग अकेले थोड़े है ज़रा न्यूज़ खोल कर देखो हजारों लोग पैदल ही बिहार जाने के लिए निकल पड़े हैं।" रंजीत की बात सुनकर किशन भी सोचने पर मजबूर हो गया परंतु अभी भी वह हिचक रहा था। "अच्छा एक बात बताओ रमेश जिस ठेले पर सब्जी घुमा कर भेजता है वह कहां है?"
 किशन के दिमाग में आईडिया आया था। "अभी तो यही है नीचे खड़ी है, परसों गया था सब्जी बेचने उधर बेचारे को किसी पुलिस वाले ने ऐसा डंडा मारा है कि 2 दिन से ठीक से चल-फिर भी नही पा रहा है।" रंजीत ने बताया।
"तो क्यों ना हमलोग उसी ठेले से चलें। 3 आदमी हम और 2 आदमी तुम, 5 आदमी उस पर आराम से एडजस्ट हो जाएंगे।" हां यह आईडिया तो बहुत अच्छा है रंजीत को भी उसका आईडिया पसंद आया। "तो फिर ठीक है हम लोग कल सुबह 5:00 बजे ही निकल जाएंगे ताकि धूप निकलने से पहले यूपी बॉर्डर पार कर जाए। तुम लोग समय पर तैयार रहना- कहते हुए किशन ने कॉल कट कर दिया। ठेला से हमनी के केतना दिन लागी बिहार पहुंचे में।" बिरजू चाचा भी उठ गए थे और काफी देर से उनकी बातें सुन रहे थे। हां कौनो दिक्कत ना भईल ता हफ्ता भर में बिहार पहुंचीए जाईल जाईल जाई। 


वह किचन में इस उम्मीद से गया कि कहीं किसी थैले में बचा-खुचा राशन मिल जाए तो आज का काम निकल जाए। लेकिन वहां सिवाय कुछ मसालों के पैकेट के और कुछ भी ना मिला।‌ अंततः वह निराश होकर राशन के लिए बाहर निकल कर गली में आ गया। काफी दूर तक चलने के बाद भी उसे किराने की कोई दुकान दिखाई ना पड़ा। बस एकाध मेडिकल स्टोर थे जो खुले हुए थे। "राशन नहीं मिला तो वह आसीफा आंटी से एक किलो चावल उधार ले लेगा।" उसने सोचा। तभी उसे रफीक अंकल की बात याद आ गई। "सुनो लड़कों! दो दिनों के अंदर रूम खाली हो जाना चाहिए। वरना मैं सारा सामान बाहर फेंक दूंगा।"कल सुबह-सुबह ही उन्होंने सभी किरायेदारों को सख्त हिदायत दी थी।
 "नहीं-नहीं!"
 उसने अपना सिर हिलाया।
"लगता है आज भूखे ही सोना पड़ेगा" यही बात सोचता हुआ और तेजी से कदम बढ़ाया जा रहा था। तभी उसे एक मिल्क पार्लर खुला हुआ दिखाई दिया। "चलो कुछ तो खाने को मिला।" उसने जल्दी से 1 किलो दूध और ब्रेड के दो पैकेट खरीदे और वापस आ गया। उस रात उन्होंने केवल दूध-ब्रेड ही खाया और सो गए।
 
अगली सुबह 4:00 बजे ही बिरजू चाचा ने सबको जगा दिया। सब नहा धोकर तैयार हुए और अपने कपड़े इत्यादि पैक करके रंजीत के रूम पर पहुंच गए। जो उनके रूम से करीब 1 किलोमीटर के फासले पर था। वहां रंजीत और रमेश पहले से ही तैयार बैठे थे। रमेश अभी भी लंगड़ा कर चल रहा था। विनय ने उसका नीचे से पैंट सरका कर देखा तो घुटने के नीचे चोट का काला निशान साफ दिखाई दे रहा था। विनय और श्याम ने उसे सहारा देकर ठेले पर बैठाया और फिर बाकी लोग भी बैठ कर चल पड़े। विजय ठेला चलाने लगा। 
"बाप रे बाप!
ऐसा सीन तो मैंने सिर्फ गदर फिल्म में ही देखा था।" जैसे ही वे गली से निकल कर मेन रोड पर आए रमेश आश्चर्यचकित हो उठा। हजारों की संख्या में लोग अपना-अपना सामान लिए रोड पर पैदल चल रहे थे। सचमुच ऐसा दृश्य तो केवल भारत-पाकिस्तान के बंटवारे के वक्त ही देखने को मिला था। श्याम ने भी अपना मास्क के नीचे सरका लिया। "अच्छा अब जल्दी से अपना मास्क ऊपर कर लो वरना हम लोग रास्ते में ही रह जाएंगे।" किशन ही इन सब में सबसे पढ़ा-लिखा और समझदार था। दोनों ने फटाफट अपना मास्क पर चढ़ा लिया। करीब 3 घंटे चलने के बाद वे यूपी बॉर्डर के पास पहुंच गए। वहां काफी संख्या में पुलिस वाले मौजूद थे, जो भीड़ को नियंत्रित करने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। 
"रुको रुको!"
विनय ने तेजी से खेला आगे निकालना चाहा लेकिन एक पुलिस वाले ने डंडा आगे करके उसे रोक दिया। विनय पहले ही डंडे का कमाल देख चुका था इसीलिए वह डंडा खाने के मूंड में बिल्कुल नहीं था। "चलो उधर ठेला साइड करो, इतने सारे लोग एक साथ क्यों बैठे हुए हो।"
 पुलिस वाले ने कड़कती आवाज में पूछा। "सर हम सब लोग एक ही गांव के लोग हैं और हम लोग अपने गांव जा रहे हैं।" किशन ने बैठे-बैठे कहा। "तो क्या हुआ, चलो सब ₹500-₹500 फाईन निकालो।" पुलिस वाले ने डंडा लहराया। "सर हम सब ने मास्क तो लगाया है ना!" 
रंजीत सर खुजलाते हुए बोला ।
"अच्छा मास्क लगाया है और सोशल डिस्टेंसिंग कहां है! चल अब ज्यादा बकवास मत कर फटाफट 5 आदमी के ₹2500 निकाल वरना सबको उठा कर बंद कर दूंगा।" पुलिस वाले की त्योरियां चढ़ आई। किशन और रंजीत के काफी मान-मनौव्वल करने के बाद वह ₹2000 लेने को राजी हुआ। किशन को ₹2000 मुफ्त में चलेेेेे जाने पर बड़ा दुख हुआ क्योंकि अभी भी उन्हेंं बहुत लंबा सफर तय करना था और उनके पास ज्यादा पैसे भी नहीं थे। खैर किसी तरह जान छुड़ा कर वे वहां से चल पड़े।


"यार अब तो बहुत जोरों से भूख लग रही है।" रंजीत ने पैडल मारते हुए कहा। रंजीत को ठेला चलाते हुए करीब 1 घंटे हो चुके थे। चलते-चलते दोपहर का वक्त हो चुका था। "हां भूख तो अब सबको लग चुकी होगी! देखो जहां कुछ खाने पीने की इंतजाम हो वहीं पर रुकना। थोड़ी दूर चलने के बाद रंजीत ने देखा कि एक जगह पर कुछ लोग खाने की थैलियां बांट रहे हैं। रंजीत ने वहीं एक पेड़ की छांव में ठेला रोक दिया।
 "यहां क्यों रोक दिया क्या हम लोग भीख मांग कर खाएंगे।" किशन एक खुद्दार आदमी था।
"हां तो और कोई रास्ता भी नहीं है, तुमने रास्ते में देखा नहीं कि सारे होटल बंद पड़े हैं। क्या बिस्कुट और नमकीन खाने से भूख मिट जाएगी।"
शायद रंजीत सच ही कह रहा था। केवल बिस्कुट और नमकीन खाकर 1000 किलोमीटर ठेला नहीं चलाया जा सकता था।
  "कभी सोचा नहीं था कि ऐसे दिन भी आएंगे कि भिखमंगो की लाइन में लगना पड़ेगा। किशन को भी उसकी बात तर्कसंगत लगी। "बेटा इंसान के वक्त के अनुसार खुद के ढाल लेवे के चाही।"
बिरजू चाचा ने भी समझाया। मगर यहां तो भुखे लोगों की बहुत लंबी लाइन लगी है। 
"आप लोग आराम करो! मैं जाकर सभी लोगों के लिए खाना लेकर आता हूं। श्याम भोज खाने में हमेशा सबसे आगे रहता था। करीब 30 मिनट तक लाइन में खड़े होने के बाद श्याम का नंबर आया तो उसने पांच पैकेट मांगे। भोजन वितरण करने वाले आदमी ने पहले तो आनाकानी की लेकिन जब श्याम ने ठेले पर बैठे बाकी लोगों की ओर इशारा किया तो उसने पांच पैकेट दे दिए।
उन्होंने पैकेट खोल कर देखा तो उसमें 4-4 रोटियां और आलू की भुजिया थी। बहरहाल जो भी था उस वक्त पेट भरने के लिए काफी था। सबने आराम से भोजन किया और फिर वहां से आगे चल पड़े। अबकी बार ठेला चलाने के बारी किशन की थी। उसने इससे पहले कभी ठेला चलाया नहीं था लेकिन सौभाग्य से रोड बिल्कुल ढलान वाला था इसलिए उसे ठेला चलाने में बहुत मजा आ रहा था लेकिन उसकी यह खुशी ज्यादा देर तक नहीं टिक सकी क्योंकि करीब 10 किलोमीटर चलने के बाद चढाई वाला एक पुल आ गया। चढ़ाई भी ऐसी कि ठेला आगे चढ़ने के बजाएं पीछे जाने लगा। नतीजतन सबको उतरकर धक्का लगाना पड़ा। "अब मेरे पैरों में तनिक भी जान नहीं बची है।"
 करीब 500 मीटर तक धक्का लगाने के बाद जब वे पुल पर चढ़े तो किशन हांफने लगा।
 बारी अब श्याम की थी अतः उसने ड्राइविंग सीट संभाल ली।

"कुछ अंदाजा लग रहा है किशन भैया कि हम लोग कहां तक पहुंचे हैं।" चलते-चलते अब शाम ढल चुकी थी और श्याम के पैर भी जवाब देने लगे थे। "पता कैसे चलेगा! हम लोग तो हमेशा ट्रेन के रास्ते से आते हैं" किशन को पेशाब लग आई थी इसलिए उसने श्याम को रुकने का इशारा किया। "भाई साहब यह कौन सी जगह है?" रंजीत में वहां से गुजरते एक राहगीर से पूछा। "हमको तो खुदे नहीं पता कि हम कहां पहुंचे हैं तुमको कैसे बताएंगे।"
"तुमको कहां जाना है?"
"बिहार"
"बिहार में कहां?"
"गोपालगंज जिला।"
राहगीर ने चलते-चलते बताया।
"बस सीधे चलते रहो सब लोग बिहार ही जा रहे हैं।" रंजीत ने विजय से कहा जो अब ड्राइविंग सीट संभाल चुका था।
"देखो तो कितना टाइम हो रहा है?"
किशन सीट से उतरते हुए बोला।
काफी देर चलने के बाद वे एक लाइन होटल पर रुके हुए थे। बिरजू चाचा और रमेश को छोड़कर सब बारी बारी से ठेला चला चुके थे।
"10:00 बज रहे हैं।"
रंजीत ने मोबाइल पर टाइम देकर बताया।
"चलो कुछ खाना वाना देखते हैं भूख लग गई है।" किशन और रंजीत ने जाकर पता लगाया तो लाईन होटल पर खाना मिल रहा था लेकिन वहां बैठकर खाने की इजाजत नहीं थी। "जाकर सबको बोल दो कि आकर हाथ मुंह धो लें।"
रंजीत में 5 आदमी के लिए रोटी तड़का ऑर्डर किया और हाथ-पैर धोने लगा। " चाचा चलो हाथ मुंह धो लो, फिर खाना खाते हैं।"
रमेश ने उंघाते हुए बिरजू चाचा से कहा।
होटल पर ज्यादा भीड़ भी नहीं थी इसलिए खाना लगाने में ज्यादा देर नहीं नहीं हुई।
जब तक सब हाथ मुंह धोते तब तक बिरजू और किशन खाना पैक करा कर ला चुके थे। दिन भर मेहनत करने के बारे में थक कर चूर हो चुके थे इसीलिए खाना खाते ही सबको नींद आने लगी। अतः वे लोग वही पर सो गए। सुबह उठकर सबने आंख-मुंह धोया और चाय पी कर आगे चल पड़े।


"किसी के पास कुछ पैसा-वैसा बचा है? मेरे पर्स तो अब ₹1 भी नहीं है।" रंजीत ने खाली पर्स सबको दिखाते हुए पूछा। 4 दिनों तक चलने के बाद वे बिहार-यूपी के बार्डर करीब पहुंच चुके थे।‌ रात को 8:00 बजे वे एक बंद पड़े लाइन होटल पर रुके हुए थे। प्रतिदिन तेज धूप में ठेला चलाने की वजह से सबकी हालत बिल्कुल खराब हो चुकी थी। पिछले पांच-छह दिनों से उन्होंने ठीक से भोजन भी नहीं किया था। दो रातें तो उन्होंने केवल बिस्कुट के सहारे गुजारी थी। लेकिन अब उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि उनके पास पैसे बिल्कुल खत्म हो गए थे। सबने अपनी-अपनी जेबें टटोली तो कुल ₹28 जमा हुए। लेकिन 5 आदमी के बीच कितने पैसों से क्या होने वाला था। "लगता है हम सब भूख से रास्ते में ही मर जाएंगे।"
रमेश अब घर पहुंचने की उम्मीद खोने लगा था।
"नहीं हम इतनी जल्दी हिम्मत नहीं हार सकते, हमें किसी से मदद मांगनी चाहिए।" 
किशन हार मानने वालों में से नहीं था। 
"परंतु हम इतनी रात को मदद मांगें भी तो किससे, वैसे भी कोरोना के डर से कोई हमारी मदद नहीं करेगा।" रंजीत ने आशंका जाहिर की।
"जब ऐसे ही मरना ही है तो कोशिश करने में क्या हर्ज है?" 
"चलो देखते हैं!"
बाकी तीनों को वहीं पर छोड़कर रमेश और किशन हाईवे किनारे बने घरों की तरफ बढ़ गए।
"कौन है?"
रंजीत ने दरवाजे पर लगे बेल को दबाया तो भीतर से आवाज आई। "अंकल जी हम लोग परदेसी हैं और हमें थोड़ी मदद की जरूरत है।"
रंजीत को बोलने में भी शर्म आ रही थी।
यह कोई धर्मशाला है क्या चलो जल्दी भागो यहां से।" रंजीत ने‌ नाराजगी से किशन की तरफ देखा तो किशन आगे बढ़ गया।
"आंटी जी हम लोग दिल्ली से आ रहे थे लेकिन हम लोग के पास पैसा बिल्कुल खत्म हो गया है और हम लोग दो दिनों के भूखे हैं क्या..
किशन की बात पूरी होने से पहले ही उस अधेड़ महिला ने दरवाजा खट बंद कर दिया।
किशन के बार-बार खटखटाने पर भी जब कोई प्रतिक्रिया नहीं आई तो वे लौट कर जाने लगे।
"कौन है?" 
 वे दो-चार कदम ही चले थे कि पीछे से किसी पुरुष आवाज आई। दोनों मुड़कर वापस आए और उस व्यक्ति से अपनी मजबूरी बताई।
आप लोग कुछ दे प्रतीक्षा कीजिए मैं कोई उपाय करता हूं। यह कहकर व्यक्ति अंदर चला गया।
करीब 30 मिनट तक इंतजार करने के बाद वह व्यक्ति हाथ में एक बड़ा सा थैली लिए बाहर आया। 
"इसमें रोटी और सब्जी है आप सब लोग मिलकर खा लीजिएगा।"
दोनों ने उस व्यक्ति को धन्यवाद दिया और थैला लेकर उन तीनों के पास आ गए।
श्याम ने खोलकर देखा तो उसमें 25 रोटी और भिंडी की सब्जी रखी हुई थी।
सभी ने मिलकर रोटी सब्जी खाई और सोने की तैयारी करने लगे। तभी उधर से पुलिस की एक जिप्सी निकली और थोड़ी आगे जाकर रुक गई।


"कौन है बे?"
जिप्सी के अंदर से एक टार्च चमका और रोबदार आवाज गूंजी। 
भय के मारे किसी के मुंह से कोई आवाज ना निकली।
"कौन हो तुम लोग और यहां क्या कर रहे हो? जिप्सी सी एक सिपाही बाहर निकला और उनके करीब आ कर बोला।
"सर हम लोग बिहार के रहने वाले हैं और दिल्ली से आ रहे हैं।"
किशन ने डरते-डरते मुंह खोला।
"झूठ बोलेगा रे तू!"
"नहीं साब हम झूठ क्यों बोलेंगे"
"ठेला घुमाओ और थाने चलो. जो कहना है, वहीं पर कहना।"
सिपाही ने डंडे से इशारा किया।
"मरता ना क्या करता!" उनलोगों को उसकी बात माननी ही पड़ी। आगे पुलिस की जिप्सी और पीछे वे ठेला लेकर चलने लगे।
अभी वे थोड़ी दूर ही चले थे कि ओवर टेक‌ के चक्कर में एक ट्रक उनके बीच आ गया। पुलिस ने हाथ देकर ट्रक को रोक लिया और पूछताछ करने लगे।
"मैं तो कहता हूं कि भाग चलते हैं पता नहीं ये पुलिस वाले थाने में हमारे साथ क्या सलूक करेंगे अब हमारे पास पैसे भी नहीं है कि इन्हें देंगे और बिना पैसे के ये हमे छोड़ेंगे नहीं।" रमेश फुसफुसाते हुए बोला।
ट्रक के बीच में रुक जाने से वे लोग थोड़ी देर के लिए पुलिस की आंखों से ओझल हो गए।
"तेरे पैरों में तो दर्द है तू कैसे भागेंगा।"
किशन ने पूछा।
जब जान मुसीबत में फंसी हो तो दर्द नहीं देखा जाता।" 
"और बिरजू काका आप?" 
रंजीत ने बिरजू काका की तरफ देखा।
"हमहूं तैयार बानी।"
सबने अपना-अपना बैग उठाया और चुपचाप हाईवे के नीचे गन्ने के खेत में घुस गए।
"वे लडके भाग गए सर।" अभी वे खेत में घुसे ही थे कि पीछे से आवाज आई।
"देखो कहां गए, पकड़ो सालों को।" 
दरोगा चिल्लाया। 
हमें अपना बैग छोड़ना पड़ेगा वरना हम पकड़े जाएंगे। किशन धीरे से फुसफुसाया।
"लेकिन हमारे कपड़े!" 
श्याम धीरे से बोला।
अरे जान बची तो फिर खरीद लेंगे। अभी जान बचाओ वरना ये पुलिसवाले मार-मार कर कचूमर निकाल देंगे। और हां बैग में कोई फोटो या आईडी हो तो निकाल लो।
सबने बैग वहीं पर छोड़ा और गन्ने के खेत में रेंगने लगे। "लगता है गन्ने के खेत में घुसे है।" 
शायद किसी के शरीर से गन्ने का पौधा हिल गया था।
"जितना तेज भाग सकते हो भागो जल्दी।" 
रंजीत सबसे पहले खेत के उस पार निकल चुका था।
गन्ने खेत के उस पार निकलते ही सब जान हथेली पर ले कर भागने लगे। गेंहू और सरसों के खेतों में भागते-भागते वे काफी दूर निकल आए। जब उन्हें लगा कि वे काफी दूर निकल आए हैं तो एक गेंहू के खेत में बेसुध हो कर पड़ गए।
थकान के मारे सबका ऐसा बूरा हाल था कि वे कब नींद की आगोश में खो गए पता ही नहीं चला। सुरज की किरणों ने जब गर्मी का एहसास कराया तब सबसे पहले रमेश की नींद खुली। उसके मोबाइल निकाल कर देखा तो 10:00 बज रहे थे। उसने झकझोर कर सबको जगाया। पांचों खेत से निकाल कर सब सड़क पर आ गए।


"भाई साहब! हमें बिहार जाना है।"
किशन ने रास्ते से गुजरते एक अधेड़ आदमी से पूछा।
ये बिहार नहीं है तो और क्या है।
अधेड़ ने उसे ऊपर से नीचे तक निहारते हुए कहा। 
"बेतिया जिला यहां से कितनी दूर है?"
"थोड़ी दूर आगे एक बड़ा पुल है उसके पार सब बेतिया जिला ही पड़ता है। और बेतिया शहर यहीं कोई 70-75 किलोमीटर।"
उस आदमी ने बताया।
पुल को पार करते ही सबके अंदर एक नई उर्जा आ गई। 
"लगता है अब हम घर पहुंच जायेंगे।"
खुशी के मारे रमेश अपना दर्द भूल कर नाचने लगा। 
"ज्यादा खुश मत हो अभी बहुत दूर जाना है और वो भी पैदल।" रंजीत ने उसे याद दिलाया।
"देखो तो किसी का मोबाइल चार्ज है हम घर फोन करके कोई सवारी बुला लेते हैं।"
किशन अपने बंद पड़े स्मार्टफोन को देखते हुए बोला। सबने अपना-अपना फोन चेक किया मगर सबके मोबाइल बहुत पहले ही बंद हो चुके थे। रमेश का फीचर फोन जो सुबह टी-टी कर रहा था वह भी बंद हो चुका था। 
अब उनके पास पैदल चलने के सिवा और कोई रास्ता नहीं बचा था। 
"हमें मेन रोड से ना होकर खेतों के रास्ते से चलना चाहिए क्योंकि मैंने सुना है कि बाहर से आने वाले आदमी को पुलिस पकड़ कर किसी स्कूल में 14 दिनों के लिए बंद कर देती है।"
किशन ने सुझाव दिया।
"हां मैंने भी सुना है कि उसमें भेड़-बकरियों की तरह बहुत सारे लोगों को रखा जा रहा है। और ये भी सुना है कि वहां लोगों के साथ जानवरों जैसा सुलूक किया जा रहा है।"
रंजीत ने भी उसका समर्थन किया।
सबको यह बात पसंद आई।


भुखे-प्यासे चलते-चलते वे थककर चूर हो चके थे। दर्द के मारे पैर उठ नहीं रहे थे। लेकिन फिर भी वे पैर घिसटते हुए लागातार चले ही जा रहे थे। अब घर पहुंचना ही उनके जीवन का एकमात्र लक्ष्य रह गया था। चलते-चलते रात घिर आई। उन्होंने एक गांव के बाहर एक मंदिर में थोड़ी देर विश्राम करने पानी पिया और फिर चल पड़े।
रात के डेढ़ बज रहे थे जब वे अपने गांव पहुंचे। सारा गांव गहरी नींद में सोया हुआ था।
"इतनी रात को घरवालों की नींद खराब करना ठीक नहीं है। चलो सब हमारे घर ही सो जाओ।"
बिरजू चाचा ने कहा।
"चाचा! पहले कुछ खाना खिलाओ नहीं तो अब प्राण निकल जायेंगे।
रंजीत ने बिरजू चाचा के घर का ताला खोलते हुए कहा।
"हां चाचा! जल्दी से कुछ खिलाओ।"
किशन ने भी कहा।
सब्जी त नईखे चावल-दाल बा थोड़ा ठहर लोग खिचड़ी बनावत बानी।
थोड़ी ही देर में खिचड़ी बन कर तैयार थी। सबने भरपेट खिचड़ी खाई और सो गए।
"तब चाचा" फेर कब दिल्ली चले के बा"
सुबह नींद खुलते ही किशन ने शरारत से मुस्कुराते हुए कहा।
"बाप रे बाप! अब भले गांवें में कमाके खाईब लेकिन दिल्ली कबहू ना जाईब।
बिरजू चाचा ने ना में सिर हिलाते हुए कहा तो सभी ठहाके मारकर हंसने लगे।
समाप्त

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