गरीबी, मजबूरी, मेहनत, संघर्ष जूनून और सफलता की एक प्रेरणादायक कहानी

motivational story in hindi for success | inspirational story in hindi

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दोस्तों इस कहानी के पहले और दूसरे भाग में अपने पढ़ा कि मेरा जन्म एक अत्यंत गरीब परिवार में हुआ था। मेरा बचपन एक ऐसे माहौल में गुजरा था। जहां रात दिन परिवारिक कलह और लड़ाई झगड़े हुआ करते थे। गरीबी की वजह से मुझे 14 साल की उम्र में ही पढ़ाई छोड़कर परिवार की जिम्मेदारी उठानी पड़ी। किस्मत ने मेरे साथ एक मजाक और किया कि मुझे बचपन में ही एक लड़की से सच्ची मोहब्बत हो गई। एक तरफ गरीबी का दर्द और दुसरी तरफ मोहब्बत के अनचाहे दर्द से परेशान होकर मैं परदेश भाग गया।
लेकिन वहां भी मेरे साथ एक एक्सीडेंट हो गया।
अब आगे पढ़िए .. 👇

 संघर्ष से सफलता तक

मैंने तुरंत पलटे हुए आटो से निकलने की कोशिश की। किन्तु मेरे बाएं हाथ ने साथ नहीं दिया। फिर भी पता नहीं मेरे अंदर कहां से इतनी उर्जा आई कि मैं दाएं हाथ का सहारा लेते हुए एक ही छ्लांग में ऑटो से बाहर आ गया। बाहर आ कर मैंने अपने बाएं हाथ को उठाने की कोशिश की। परंतु भयंकर दर्द होने की वजह से उठा ना सका। तब तक लोगों की भीड़ भी जुट चुकी थी। कुछ लोग ऑटो के अंदर दबे हुए घायलों को बाहर निकाल रहे थे तो कुछ लोग ऑटो को सीधा करके में लग गए। ऑटो चालक का दायां पैर घुटनों से टुट चुका था और वह बूरी तरह चीख रहा था। एक महिला जो मेरे बगल में बैठी हुई थी। उनका सिर फट चुका था और वे खून से लथपथ हो चुकीं थी। मैं एक पेड़ का सहारा लेकर कंधे में हो रहे भयंकर दर्द को बर्दाश्त करने की कोशिश कर रहा था। तभी दर्द से बूरी तरह कराहते हुए भैया मेरे पास आये। उनके चेहरे के हाव-भाव बता रहे थे कि उनका दर्द मुझसे भी ज्यादा है।
लोगों को उस महिला और ड्राइवर की हालत ज्यादा गंभीर लगी इसलिए उन्होंने हम पर ध्यान नहीं दिया।
 "क्या हुआ है आपको?"
मैंने अपने दर्द को नजरंदाज करते हुए पूछा।
आह.. आह.. पता नहीं क्या हुआ है मगर दोनों हाथ नहीं उठ रहे हैं और पीठ में बहुत तेज दर्द हो रहा है..आह..
वे दर्द के मारे तड़प रहे थे।
" आह.. अब लगता है मैं जी नहीं पाऊंगा।"
वे कराहते हुए बोले।.
"हिम्मत मत हारिए, कुछ नहीं होगा।" 
"उनका दर्द देखकर मैं अपना दर्द भूल चुका था।"
"दिल्ली में किसी का नंबर है आपके पास"
दाएं हाथ से उनकी पीठ को दबाते हुए मैंने पूछा।
"देखो मोबाइल में नंदकिशोर भाई का नंबर होगा"
उन्होंने किसी तरह खुद को संभलते हुए अपने जेब की तरह इशारा किया। मैंने उनके जेब से मोबाइल निकाल कर कांटेक्ट लिस्ट खंगालने लगा।
सौभाग्य से उनका मोबाइल टुटा नहीं था और अभी चालू था। कुछ ही मिनटों में उनका नंबर मिल गया। नंदकिशोर भाई हमारे पड़ोसी थे। जो सिविल लाइन में ठेकेदारी करते थे। नंबर मिलते ही मैंने तुरंत डायल किया। 
"हेलो कौन! एक-दो मर्तबा रिंग होने के बाद उधर से आवाज आई। काॅल उनके बड़े बेटे ने उठाया। मैंने संक्षेप में उससे सारी बात बताई और अपना लोकेशन बता कर उसे जल्दी आने को कहा।
मैं तो अभी अपने रूम से काफी दूर हूं,
"एक काम किजिए! कोई ऑटो पकड़ कर किसी तरह मेरे रूम पर चले आईये। तब तक मैं भी रूम पर पहुंचता हूं।"
उसने अपने रूम का पता बता कर काॅल कट कर दिया।


आह ..क्. क्या कहा उसने"
भैया अभी भी दर्द से बेचैन थे।
चलिए! हमें खुद ही उनके पास चलना होगा, वे अभी नहीं आ सकते।" कहते हुए मैं अपने दाएं हाथ से दो बैग और झोला जिसमें कुछ औजार थे, सबको समेटने लगा।
नहीं! मैं नहीं जा पाऊंगा। मुझसे दर्द बर्दाश्त नहीं हो रहा।"
"हमें चलना ही होगा भैया! आप बहुत हिम्मत वाले हैं। आप इस तरह हिम्मत नहीं हार सकते।"
मैंने हौसला बढ़ाया।
मेरा मोटिवेशनल काम कर गया और वे सारी हिम्मत बटोर कर उठ खड़े हुए। मैंने ‌एक बस वाले को हाथ देकर रूकवाया और किसी तरह उसमें सवार हो गए। हमने कंडक्टर अपनी परेशानी बताई तो उसनेे किसी तरह भैया को सीट उपलब्ध करा दी। हालांकि मुझे अपने बैग्स को रखने का जगह भी नहीं मिल पाया। करीब आधे घंटे के सफर के बाद हम उसके बताएं हुए एड्रेस पर पहुंच गए।

बस से उतरते ही हमने देखा कि वह रोड के किनारे ही हमारा इंतजार कर रहा था। आधे घंटे से करीब 30 किलो वजन को उठाएं-उठाएं मेरा दायां हाथ सूज चुका था। उसने तुरंत ही मेरा कुछ बोझ हल्का किया और अपने पीछे चलने का इशारा किया। उससे पीछे-पीछे हम एक अर्धनिर्मित मकान में पहुंच गए। शायद वे वहीं पर काम भी करते थे और रहते भी थे। हमने पानी वगैरा पी और थोड़ी देर आराम किया। मुझे दर्द से थोड़ी राहत महसूस हो रही थी मगर भैया अभी भी दर्द से बेचैन थे। थोड़ी ही देर में नंदकिशोर भैया आ गए। उन्होंने हमें तुरंत एक सरकारी हॉस्पिटल में एडमिट कराया। थोड़ी पूछताछ के बाद डाक्टर ने एक्स-रे कराने को कहा। 
एक्स-रे रूम में जाते समय मेरा दिल जोरों से धड़क रहा था।
हे ईश्वर! ऐसा चमत्कार करना कि मेरे हाथ ना टुटे हो।" मैंने मन-ही-मन ईश्वर से प्रार्थना की।
चूंकि मैं बचपन से ही कसरत इत्यादि करता था इसलिए ये विश्वास भी था कि मेरी हड्डियां काफी मजबूत है। जो इतनी आसानी से नहीं टुट सकती।
परंतु मेरा विश्वास उस वक्त टुट गया। जब एक्स-रे की रिपोर्ट आई। मेरे बाएं कंधे की हड्डी फैक्चर हो चुकी थी। मुझे अपने बदकिस्मती पर बहुत रोना आया लेकिन मैं चाह कर भी रो नहीं पाया। भैया का रिपोर्ट भी कुछ ऐसा ही आया। उनके दोनों शोल्डर ब्लेड अपनी जगह से खिसक गए थे।
खैर मलहम पट्टी करवाने के बाद हम दवाई लेकर रूम आ गए। 
इंसान जब दुख में होता है उसे अपनों की बहुत याद आती है। मुझे भी उसकी बहुत याद आ रही थी। मगर मैं किसके साथ अपने दिल की हालत बयां करता। 
मेले में अपने एकलौते बेटे को उसके पसंद के खिलौना ना दिला पाने पर एक गरीब पिता जो महसूस करता है। मेरी भी वहीं हालत थी।


रात हो चुकी थी। दिल्ली की आसमान पर चांद पुरे गुरूर से चमक रहा था। मैं गिट्टी के ढेर पर बेसुध पड़ा सूनी आंखों से चांद को निहार रहा था। लेकिन उस चांद की किरण मेरे दिल तक नहीं पहुंच पा रही थी। मेरे तो दिल के साथ-साथ किस्मत में भी अंधेरा छाया हुआ था। पूरे शरीर में केवल पेट और कंधे ही थे। जहां कुछ हरकत महसूस हो रही थी। कंधे से दर्द की चुभन उठ रही थी और पेट से भुख की लहर। सुबह से हमने कुछ भी नहीं खाया था इसलिए भुख लगना लाजिमी था। भुख को क्या पता कि आपकी जेब में पैसे है या नहीं। 9 बज चुके थे परंतु इधर भी अभी तक भोजन का कोई प्रबंध नहीं दिख रहा था। नंदकिशोर भाई अपने बड़े बेटे के साथ शायद राशन-पानी के इंतजाम में ही निकले हुए थे‌ और उनका छोटा लड़का हमारे पास ही बैठा हुआ था। बातों ही बातों में उसने बताया कि मकान मालिक कई दिनों से पैसे नहीं दे रहा है। जिसकी वजह से उनको भी खाने के लाले पड़े हुए थे। हमारे पास जो थोड़े बहुत पैसे थे। वह भी हमारे इलाज में खर्च हो चुके थे। इसलिए उनका इंतजार करने के अलावा कोई चारा नहीं था। रात के करीब 10 बजे दोनों बाप-बेटे हाथों में दाल-चावल की थैलियां लिए हाजिर हुए। आते ही उन्होंने बताया कि आज भी मालिक ने पैसा नहीं दिया। जो वे जो भी लाए थे उन्होंने बनाया और हमें खिलाया। उनके पास हम करीब तीन-चार दिनों तक रहे। पैसे की परेशानी तो उनको बहुत थी। लेकिन वे इधर उधर से व्यवस्था करके खुद भी खाते और हमें भी खिलाते। हालत ऐसी थी कि कई बार हमें केवल चाय और बिस्कुट पर ही दिन गुजारना पड़ता।

सुनिए यह गीत 👇

एक रात फिर से गिट्टी के ढेर पर लेटा हुआ किन्हीं सोचों में डूबा हुआ था। तभी मेरी कानों में कहीं से बजते हुए गीत के बोल सुनाई पड़े।
गाने की आवाज में दिल तक पहुंचते ही दिल में छुपे हुए दर्द, गम, बेबसी, जुदाई, तनहाई और गरीबी के एहसास सभी एक साथ मुझ पर टूट पड़े। कई दिनों से जो गुब्बार मैंने दिल में छुपाए रखा था। वह सब आंसू के रूप में बाहर आने लगा। उस रात में मैं इतना रोया, इतना रोया कि आंखें बूरी तरह से सूज गई।
"मेरा दिल यहां बिल्कुल नहीं लग रहा है। मुझे घर किसी भी हालत में आज घर जाना है।"
 सुबह उठते ही मैंने भैया से कहा। 
दिल तो भैया का भी नहीं लग रहा था। भूखे पेट भला किसका दिल लगता है। लेकिन दिक्कत यह थी कि हमारे पास टिकट के लिए पैसे नहीं थे।
भैया ने नंदकिशोर भाई से बात की और कहा कि वे किसी तरह टिकट के पैसे का इंतजाम करा दें।
"ठीक है कोशिश करता हूं"
उन्होंने आश्वासन दिया।
लेकिन हमारे देश के नेताओं की तरह उनका आश्वासन भी केवल आश्वासन ही रह गया।
दिन भर इंतजार करवाने के बाद शाम को वे खाली हाथ ही वापस आए। 
"बिल्डर से बात हुई है उसने कल पैसे देने का वादा किया है,अगले दिन पैसों का प्रबंध जरूर हो जाएगा।"
उन्होंने फिर भरोसा दिलाया। 
"दिनभर फोन करता रहा लेकिन कमीने ने फोन नहीं उठाया, लगता है साले का काम बंद करना पड़ेगा।" 
अगले दिन रात को उन्होंने मकान मालिक को जी भर कर गालियां दी।
"लगता है आज भी पैसों का प्रबंध नहीं हो पाएगा हमें बिना टिकट ही जाना पड़ेगा।"
अगली सुबह मेरा सब्र जवाब दे गया।
और टीटी ने पकड़ा तो…?
भैया ने आशंका जताई।
"हमारे पास हॉस्पिटल के पेपर है ना, उसके द्वारा हम विकलांग वाले डब्बे में बैठकर जा सकते हैं।"
मैंने भैया को सुझाव दिया।
भैया को भी यह सुझाव जंच गई। शायद वे भी अब बिल्कुल उब चुके थे।


पुरानी दिल्ली स्टेशन पास में ही था। हम पैदल ही स्टेशन पर पहुंचे और विकलांग वाले डब्बे में बैठ गए। उस डब्बे बहुत सारे अपाहिज और भिखमंगे बैठे हुए थे।
ट्रेन तो निकल पड़ी लेकिन मेरे मन में अभी भी ये डर बैठा हुआ था कि कहीं टीटी पकड़ ना ले।
मेरा डर अकारण नहीं था। उस समय ट्रेन में बहुत ज्यादा चेकिंग चल रही थी। आखिरकार में अगर सही साबित हुआ। लखनऊ आते-आते टीटी ने हमें पकड़ ही लिया। 
मेरी तो धिग्धी ही बढ़ गई।
जब टीटी ने कहा कि जल्दी से 1200₹ निकालो नहीं तो अगले स्टेशन में उतार कर रेलवे पुलिस के हवाले कर दूंगा। भैया हॉस्पिटल के पेपर दिखाकर अपनी मजबूरी बताने लगे। हमारी मजबूरी सुनकर कुछ लोगों ने भी हमारा सपोर्ट किया। लेकिन वह किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था।
 मैं मन ही मन में ईश्वर से प्रार्थना करने लगा कि हे भगवान किसी तरह अबकी बार बचा लो।"
संयोग से अबकी बार मेरी प्रार्थना कुबूल हो गई। 
टीटी अगले स्टेशन चुपचाप उतर गया।
मैंने ईश्वर का लाख-लाख शुक्रिया अदा किया।
उसके बाद रास्ते में हमें किसी और टीटी से मुलाकात नहीं हुई।
अगले दिन कस्बे के रेलवे स्टेशन पर जब मैं उतरा। तब जाकर मुझे कुछ सुकून मिला। सुकून क्या मिला, शर्मिंदगी के एहसास से मेरा सर झुका जा रहा था। 
"घर वाले सोच रहे होंगे कि मेरा बेटा बाहर से पैसे कमा कर लाएगा। मगर मैं तो फिर से अपने परिवार पर बोझ बनने आ गया। छी:! मैं कैसा बदनसीब और निकम्मा इंसान हूं।" रास्ते भर मैं यही बात सोचते जा रहा था।
"उस दिन पहली बार मुझे एहसास हुआ कि
दुनिया में आपकी मां बाप से ज्यादा आपको प्यार करने वाला और कोई नहीं है।"
"कैसा हाल हो गया है मेरे बाबू का"
"मां" मेरी हालत देख कर रोने लगी।
"इसीलिए ना मैं कहता हूं कि बाहर मत जाओ"
बाबूजी ने भी नसीहत दी।
अगले दिन बाबूजी मुझे हॉस्पिटल ले गए और दोबारा से मेरा इलाज करवाया।
जिस लड़की से मैं बेपनाह प्यार करता था जिसको मैं अपनी जिंदगी समझता था।
उसे मेरी हालत से कोई फर्क नहीं पड़ा था। वह तो अपनी जिंदगी में बहुत खुश नजर आ रही थी।
अब मुझे एहसास हुआ कि मैं शायद एकतरफा प्यार का शिकार हूं। परन्तु प्यार एकतरफा हो या दोतरफा दिल को उससे क्या फर्क पड़ता है। वह तो जहां लग जाता है वहां लग जाता है।
मैं एक अजीब सी उलझन में था क्योंकि दिल था कि किसी भी हाल में मानने को तैयार नहीं था।


किन्तु अब तक दो बातें तो मैं समझ ही चुका था कि पहला ये कि उस लड़की का प्यार मेरी किस्मत में नहीं है और दूसरा ये कि अगर मैंने जल्द ही कुछ नहीं किया तो मेरे परिवार को भुखों मरने की नौबत आ जाएगी। मुझे प्यार या परिवार दोनों में से किसी एक को ही चुनना था। मैंने निःसंदेह अपने परिवार को चुना और उसे भुलाने की कोशिश करने लगा। परिवार का खर्च चलाने के लिए मैंने कुछ महीनों तक लेबर का काम भी किया लेकिन जल्द ही मुझे एहसास हो गया कि इस काम से मेरा भविष्य उज्जवल नहीं हो सकता। मैंने ड्राइवरी लाईन में काफी वक्त बिताया किया था इसलिए मुझे काफी अनुभव भी प्राप्त हो चुका था। मैंने तय किया कि बाबूजी की ईच्छा को पूरा करने के लिए मुझे ड्राइवरी ही सीखनी चाहिए। उस समय खलासी की तनख्वाह थी ₹600 महीना। मैंने कुछ परिचित ड्राइवरों से संपर्क किया और उनके साथ मन लगाकर ड्राइवरी सीखने लगा। इधर मेरे महीने के ₹600 मिल जाते और उधर बाबूजी और मां गांव में ही दूसरों के खेतों में मजदूरी करते। कुल मिलाकर बड़ी मुश्किल से परिवार का गुजारा हो रहा था।
अब बस यहीं उम्मीद थी कि जल्दी से ड्राइवर बन जाऊं और ढेर सारे पैसे कमाऊं। हालांकि मैं लाख कोशिशों के बावजूद भी उस लड़की को भूल नहीं पा रहा था। फ़िर भी अपने मां-बाप की तकलीफों का ख्याल करते हुए मैं खुब मन लगाकर गाड़ी सीखने लगा। कुछ ही दिनों में में एक कुशल ड्राइवर बन गया। अब बस मेरे ड्राइविंग कैरियर की शुरुआत होनी बाकी थी।
अक्टूबर-नवंबर का महीना था। सुरज की किरणों और धुंध के बादलों की जंग शुरू हो चुकी थी। अर्थात सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी। मैं छठ पर्व की छुट्टियां ले कर घर आया हुआ था।‌ आपको बता दें कि छठ पूजा बिहार का सबसे लोकप्रिय पर्व है। पूरे गांव में हर्षोल्लास का माहौल था। लोग नये-नये कपड़े खरीद रहे थे। लेकिन जैसे-जैसे छठ पूजा के दिन नजदीक आ रहे थे। मेरे दिल निराशा और बेबसी के रंग गहरे हो रहे थे। वजह ये थी कि काफी कोशिशों के बावजूद भी मैं अपने घरवालों के लिए कपड़े नहीं खरीद पा रहा था। 
मैं कितना अभागा हूं कि अपने मां के लिए एक साड़ी भी ना खरीद पाया। अपने बाबूजी के लिए एक कुर्ता भी ना ले पाया। कम से कम बाबूजी एक जूता तो खरीद लिया होता, कल ही तो देखा था। उनकी चप्पल पीछे से एकदम घीस चुकी थी। सब लोग तैयार हो कर छठ घाट पर जा रहे थे और मैं बिस्तर पर औंधे मुंह पड़ा रो रहा था। अचानक मुझे अपने बचपन का वह दिन याद आ गया। जब मै केवल 10 साल का था। 
यहीं दिन था और इसी प्रकार बाबूजी के पास नये कपड़े खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। सारे घरवाले और पड़ोसी मिलकर मुझे पुराने कपड़े पहनाते रह गए। लेकिन मैंने नहीं पहना। बस मिट्टी पर लुढ़क-लूढक कर रोता रहा।
"यहां क्या कर रहे हो, नहा कर तैयार क्यों नहीं होते।" मां की आवाज़ में ने मेरी यादों का सिलसिला तोड़ दिया।
"मां मुझे लूज मोशन हो रहा है।आपलोग जाओ मैं सुबह चला जाउंगा।"
 मैंने तबीयत खराब होने का बहाना बना दिया।
लेकिन मुझे तो नहीं जाना था तो मैं सुबह भी नहीं गया।
 किसी ने ठीक ही कहा है कि मेहनत का फल मीठा होता है।
खैर छुट्टी से वापस आते ही मुझे वो खुशखबरी मिली जिसका सबको इंतजार था। गाड़ी मालिक ने मेरी मेहनत से खुश हो कर मेरा प्रमोशन कर दिया था। यानी मुझे मेन ड्राइवर बना कर टूर पर भेजने का फैसला हो गया था।
"ये लो ₹1000 शहर के बाहर वाले पेट्रोल पंप से डीजल भरवा लेना।" गाड़ी मालिक ने मुझे गाड़ी की चाबी और पैसे देते हुए कहा।
मैंने ट्रक स्टार्ट की और निकल गया। किन्तु अभी तक मैं छठ पूजा के दिन वाले इमोशन से बाहर नहीं निकल पाया था।
अचानक मेरे दिमाग में एक ख्याल आया।
 "अगर मैं ₹700 के डीजल भरवा लूं तो ₹300 में बापूजी के जूते आ जाएंगे।" 
"कहीं मालिक को पता चल गया तो..
"अरे कैसे पता चल जाएगा वह लोग देखने थोड़े ही आयेंगे"
"अरे नहीं! यह तो चोरी होगी"
"ड्राइविंग लाइन में अगर ड्राइवर चोरी नहीं करें तो उसका पेट नहीं भर सकता। इतनी महंगाई में 8-10 हजार रुपयों से क्या होगा भला।" मुझे अपने उस्ताद की बात याद आई थी।
वैसे भी जिस गंतव्य तक मुझे जाना था। उसके लिए ₹700 का डीजल ही काफी था।
काफी सोच-विचार के बाद आखिरकार मैंने फैसला कर लिया की डीजल ₹700 के ही डलवाने हैं। शहर के छोर पर स्थित पेट्रोल पंप पर मैंने गाड़ी रोकी और डीजल भरवाने के लिए उतर गया। डीजल भरवा कर अभी मैं पैसे दे ही रहा था। तभी अचानक वह हुआ जिसकी मैंने कल्पना भी नहीं की थी …...

आगे क्या हुआ...
 पढ़िए, अगले भाग में...




बाकी अगले महीने..

दोस्तों मैंने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया है। काफी गलतियां की है। लेकिन मैं चाहता हूं जो गलतियां मैंने की है, वह आप ना करें।
अपनी कहानी को लिखने का मेरा उद्देश्य यही है कि आप मेरी गलतियों से सीखे और अपने जीवन में बेहतर बदलाव करें। और हां कहानी आपको कैसी लगी, कृपया नीचे कमेंट करके जरूर बताएं। धन्यवाद

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