एक गरीब लड़के की गरीबी, मोहब्बत, मजबूरी, संघर्ष और सफलता की बेमिसाल कहानी

motivational true story in hindi, best motivational story in hindi for students

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दोस्तों हमारा नाम दिनेश नीर है और हम एक blogger, writer, youtuber और motivational speaker हैं। दोस्तों हमारा जन्म बहुत ही ग़रीब परिवार में हुआ हैं और हमने अपने जीवन में काफी संघर्ष किया है, बहुत सारी मुश्किलों और चुनौतियों का सामना किया है, बहुत सारी गलतियां की हैं। लेकिन हम नहीं चाहते हैं कि आप सभी को इन सब चीजों का सामना करना पड़े। इसलिए हम आपके साथ अपने जीवन की real life inspirational story  को इस उद्देश्य से शेयर कर रहे हैं कि आप हमारी गलतियां और अनुभवों से कुछ सीख सकें।  इस motivational और inspirational story के हर मोड़ पर आपको कुछ ना कुछ सीखने को जरूर मिलेगा। इस कहानी का पहला, दूसरा और तीसरा भाग हम लिख चुके हैं और यह चौथा भाग है।

नोट: कृपया इस कहानी को पढ़ने से पहले इन तीनों भागों को जरूर पढ़ें 👇

 संघर्ष से सफलता तक की कहानी, भाग-1

संघर्ष से सफलता तक की प्रेरणादायक कहानी,भाग-2

एक गरीब लड़के के जीवन के संघर्ष की प्रेरणादायक कहानी-3 


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काफी सोच-विचार के बाद आखिरकार मैंने फैसला कर लिया की डीजल ₹700 के ही डलवाने हैं। डीजल भरवा कर अभी मैं पैसे दे ही रहा था। तभी अचानक वह हुआ जो मैंने सपने में भी नहीं सोचा था। 
"क्या दिनेश! यह ठीक हो रहा है?" अचानक मेरे पीछे से एक जानी-पहचानी आवाज आई।
मैंने पीछे पलटकर देखा तो ट्रक मालिक के सबसे छोटे बेटे ऐताउल्लाह बाईक पर दोनों हाथ बांधे अचरज  भरी नजरों से मुझे घूर रहे थे। 
शायद उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मैं ऐसा कर सकता हूं क्योंकि मैं उनलोगों का सबसे भरोसेमंद आदमी था। इसलिए मैंने भी कभी यह नहीं सोचा था कि वे मुझ पर शक कर सकते हैं।
 उन्हें देखते ही मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई। मेरे मुंह से कोई शब्द नहीं निकल पाये। मैं नजरें झुकाए चुपचाप खड़ा रहा।
"ठीक है! माल खाली करके आओ फिर बात होगी।" नाराजगी भरे लहजे में कहकर उन्होंने किक मारा और तेजी से बाहर निकल गये।
मैं वहीं पर शाक्ड खड़ा रहा।
"उस्ताद गाड़ी हटाओ यार, हम भी डीजल लेनी है।" एक तेज आवाज से मेरी तन्द्रा भंग हुई।
 मेरे गाड़ी के पीछे खड़े ट्रक का ड्राइवर खिड़की से गर्दन बाहर निकाल कर चिल्ला रहा था।
मैंने भारी मन गाड़ी स्टार्ट की और धीरे-धीरे पेट्रोल पंप से बाहर निकल कर हाईवे पर आ गया। 
लोग ठीक कहते हैं,
"इज्जत कमाने में वर्षों लग जाते हैं लेकिन इज्जत गंवाने में 1 मिनट भी नहीं लगता।"



"अरे ये तुने क्या कर दिया, मैं तो पहले ही मना कर रहा था।" मेरी अंतरात्मा मुझे कचोट रही थी।
उसी वक्त मुझे एहसास हुआ कि हमारे अंदर एक अंतरात्मा होती है। जो हमारे शरीर और बुद्धि से परे होती है। जो हमें अधर्म और अनौतिक कामों से पहले हमें सचेत करतीं हैं। लेकिन हम इंसान अपनी जरूरतों अथवा ईच्छाओं के आगे उसे नजर-अंदाज कर देते हैं। 
"शाम को मैं उन्हें क्या जवाब दूंगा।"
मैं रास्ते भर रास्ते भर तरह-तरह के बहाने और उपाय तलाशता रहा। जिससे मैं उन्हें संतुष्ट कर सकूं। हालांकि मैं जानता था कि कोई बहुत बड़ा इश्यू नहीं होगा क्योंकि मोटर लाईन में यह सब आम बात थी। लेकिन मेरे लिए बात पैसों की नहीं थी बल्कि मेरे ईमान और इज्जत की थी। मैं बचपन से ही बेहद ईमानदार और मेहनती था इसलिए हर कोई मुझ पर भरोसा करता था लेकिन आर्थिक जरूरतों ने आज मुझे एक चोर बना दिया था।
बहरहाल मैं गाड़ी अनलोड करके शाम को वापस आया और माल का पेमेंट और भाड़ा इत्यादि ले जाकर एताउल्लाह भाई को सौंप दिया। आश्चर्यजनक रूप से किसी ने मुझसे उस घटना के बारे में कुछ नहीं पूछा। लेकिन उनके चेहरे के हाव-भाव बता रहे थे कि वे मुझसे अंदर ही अंदर नाराज हैं। नाराज होना उनका हक़ भी था क्योंकि वे मेरे ऊपर बहुत विश्वास करते थे और मैंने आज उनका विश्वास तोड़ दिया था।
उस रात मुझे बिल्कुल भी नींद नहीं आई। कभी मैं अपने किए पर पछताता तो कभी उनका ‌विश्वास वापस पाने के उपाय ढुंढता। काफी सोच-विचार के बाद मैंने फैसला कर लिया कि जरुरत पड़ी तो सारा दोष उस नये ड्राइवर पर डालना है, जो मेरे उस्ताद के छुट्टी पर जाने के बाद ड्यूटी पर था। क्योंकि मुझे उसका व्यवहार और चाल-चलन बिल्कुल भी पसंद नहीं आया था। सुबह मैं जल्दी उठा और फ्रेश हुआ होकर पास के होटल में नाश्ता करने चला गया। नाश्ता करके जब मैं वापस आया तो चाचाजी (गाड़ी मालिक के वृद्ध अब्बा) बरामदे में बैठे हुए थे। उन्होंने मुझे आवाज देकर बुलाया और अपने पास पड़ी कुर्सी पर बैठने को कहा। उनके पास ही गाड़ी उनके दोनों बेटे भी बैठ हुए थे। मैं नजरें झुकाए कुर्सी पर बैठ गया।


"एक बात बताओ! आज तक हमने तुम्हें किसी चीज की कमी की है? चाचाजी जी ने बड़े प्यार से पूछा।
मैंने नहीं में सिर हिलाया।
कभी गैरों जैसा बर्ताव किया है?
मैंने पुनः नहीं में सिर हिलाया।
" फिर तुमने ऐसा क्यों किया?"
मेरे पास उनके सवालों का कोई जवाब नहीं था इसलिए मैं सर झुकाए बैठा रहा।
"सच-सच बताओ कहीं ड्राइवर ने तो तुम्हें ऐसा करने को नहीं कहा था।" चाचाजी को अब भी मेरी ईमानदारी पर भरोसा था और मैं उनका भरोसा तोड़ना नहीं चाहता था इसलिए मैंने हां में सिर हिला दिया। 
मैं जानता था कि यह जरूर उस ड्राइवर का सिखाया-पढाया है। यह लड़का ऐसा काम कर ही नहीं सकता। चाचाजी ने मेरा सपोर्ट किया।
चाचाजी के बड़े बेटे सैफुल्लाह जो कि मेन मालिक थे। उन्होंने तुरंत उस ड्राइवर को काॅल किया और मेरे द्वारा लगाए गए आरोपों की तकसीद की। ड्राइवर ने स्वाभाविक तौर पर मेरे आरोपों को पूरी तरह से नकार दिया। जो कि पूरी तरह सच् भी था। हालांकि मैंने अपने आपको निर्दोष साबित करके की पूरी कोशिश की। पता नहीं उन्होंने मेरी बातों पर यकीन किया या नहीं। परंतु उन्होंने मुझे माफ कर दिया और हिदायत दी कि दुबारा ऐसी गलती नहीं होने पाए।‌ उन्होंने तो मुझे माफ कर दिया लेकिन मैं इस गलती के लिए खुद को माफ नहीं कर पाया। मैंने बचपन में
श्रीमद्भागवत गीता में पढ़ा था कि "जो हुआ अच्छा हुआ, जो हो रहा है,वह भी अच्छा हो रहा है और जो होगा वह भी अच्छा होगा।"
मैं हमेशा से इस बात याद रखता हूं और अपने जीवन की हर बूरी घटना को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखने की कोशिश करता हूं।



मैंने इस घटना से सीखा कि शायद ईश्वर ने मुझे गलत रास्ते से हटाने के लिए मेरे साथ ऐसा किया था। उस दिन मुझे एक नई सीख मिली कि हमारे जीवन में बूरी परिस्थितियां हमारी परीक्षा लेने आती है। यदि हम उसमें उत्तीर्ण हो गए तो हमारे सिद्धांतों को मजबूती मिलती है और यदि हम फेल हो गए तो हमें एक नई सीख मिलती है। परिस्थिति चाहे जैसी भी हो, हमारे पास हमेशा दो विकल्प मौजूद होते हैं। हम धर्म या अधर्म, अच्छाई या बुराई दोनों में से किसी को भी चुन सकते हैं। जैसे मैंने बुराई को चुन लिया था। लेकिन सौभाग्यवश मेरे अंदर पुर्व संस्कार जीवित थे। जिन्होंने मुझे बुराई की राह पर चलने से रोक लिया। मैंने उसी दिन प्रतिज्ञा की। "मैं जीवन में कभी भी चोरी या बेईमानी नहीं करूंगा।"
इसके साथ-साथ मैंने ये भी फैसला कर लिया कि मैं इस काम हमेशा के लिए छोड़ दूंगा। जो मुझे चोरी-बेईमानी के लिए प्रेरित करती है। गाड़ी मालिक को जब मैंने अपना फैसला सुनाया तो उन्होंने मुझे समझाने कि काफी कोशिश की। लेकिन मैं अपनी जिद पर अड़ा रहा। वैसे भी इस प्रोफेशन से मुझे शुरू से नफरत थी और आखिरकार मैंने इसे छोड़ ही दिया। यहां आप एक और बात सीख सकते हैं कि जीवन में कभी भी ऐसे प्रोफेशन को ना चुनें। जिसमें आपकी रूचि नहीं हो। लोगों की नसीहत जरूर सुनें लेकिन वहीं करें जो आपका दिल कहता हो।



बहरहाल मैं ड्राइविंग छोड़ कर घर आ गया। घर आते ही मुझे एक खुशखबरी मिली। मेरे बाबूजी को उनकी सरकारी नौकरी के बकाए रुपए मिलने वाले थे। जिसके लिए वे और उनके साथी बरसों से केस लड़ रहे थे। लेकिन मुझे उन पैसों में कोई दिलचस्पी नहीं थी। क्योंकि मेरी नज़र में वे मेहनत से कमाए गए पैसे नहीं थे। इधर गांव में करने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं था। बस मेरे उस बचपन के प्यार की धुंधली यादें थी। जिसकी अब शादी हो चुकी थी। उस वक्त मेरे जीवन का ना तो कोई लक्ष्य था और ना कोई उद्देश्य। बस मैं उसकी यादों के सहारे किसी प्रकार जिंदगी गुजार रहा था। कुछ ही दिनों में बाबूजी का पैसा आ गया। जो 6 लाख रुपए से थोड़ा ज्यादा था।
उस वक्त हमारे पास रहने के लिए ढंग का मकान भी नहीं था।हम फूस के एक छोटी सी झोपड़ी में रहते थे। जो बरसात में जगह-जगह से टपकता था। इसी पैसों के भरोसे मेरी तीसरे नंबर की बहन अनिता  (जिसकी पिछले साल ही सगाई हुई थी) की शादी की डेट भी फिक्स हो चुकी थी। बाबूजी ने फैसला किया कि पहले मकान बनवायेगें क्योंकि बहन की शादी अगले ही महीने थीं और हमारे पास ढंग का घर भी नहीं था।

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चुंकि परिवार में मैं ही सबसे पढ़ा-लिखा और समझदार समझा जाता था इसलिए बाबूजी ने मकान बनवाने की जिम्मेदारी मुझे सौंप दी। पैसा जब पास हो तो हर काम आसान हो जाता है। बड़े भाई साहब और पट्टी-पट्टीदार जो कभी हमारा समाचार भी नहीं पुछते थे। उन्होंने भी निर्माण कार्य में काफी सहयोग किया। जिसके परिणामस्वरूप मकान निर्माण कार्य काफी तेजी से हुआ और एक महीने के अंदर ही मकान बनकर तैयार हो गया। यहां मैंने एक चीज अनुभव किया कि "जब आपके पास पैसे नहीं होते तो सारे हितैषी गायब हो जाते हैं और जब आपके पास पैसे होते हैं तो ये अलादीन के चिराग की तरह प्रकट हो जाते हैं।"
बहरहाल घर का काम बिल्कुल ठीक वक्त पर पूरा हो गया क्योंकि बस दो दिन बाद ही शादी थी। ‌‌‌‌‌उस वक्त हमारे पास पैसों की कोई कमी नहीं थी इसलिए बहन की शादी बड़े धूमधाम से संपन्न हुई। विदाई होने के बाद मेरी प्यारी बहन अपने ससुराल चली गई। तब जाकर बाबूजी ने चैन की सांस ली क्योंकि आर्थिक तंगी के कारण कई वर्षों से उनके लिए बेटी की शादी चिंता का विषय बनी हुई थी। लेकिन मैं अब बिल्कुल अकेला हो गया था, क्योंकि बहनों से मुझे बहुत लगाव था। खासकर अनिता से। वही मेरा हमदर्द था और मेरी भावनाओं को समझती थी। मेरी अधुरी प्रेम कहानी की उसको भी खबर थी और मेरी उदासी को लेकर हमेशा चिंतित रहती थी।
( एक गरीब लड़के के सच्चे प्यार की दर्द भरी अधूरी प्रेम कहानी ) वह छोटे बच्चों की तरह मेरा ख्याल रखती थी। यदि मैं मजाक में भी अपने मरने की बात कर देता तो वह रोने लगती। लेकिन इन दो कारणों से मैं बहुत खुश भी था। उसकी शादी एक तो शहर में और दूसरा अमीर परिवार में हुआ था।

हमारे यहां शादी के एक या दो दिनों के बाद बहुभोज होता है। जिसमें रिश्तेदारों और हितैषियों को बहु के द्वारा स्पर्श किया हुआ भोज खिलाया जाता है और सभी लोग बहु को कुछ ना कुछ गिफ्ट देते हैं। लड़के वाले की तरफ से हमें भी निमंत्रण मिला था। बाबूजी को कहीं आना-जाना पसंद नहीं था इसलिए उन्होंने मुझे जाने के लिए कहा। "चलो इसी बहाने बहन का समाचार भी मिल जायेगा और उसके ससुराल वालों का व्यवहार भी पता चल जाएगा।" यहीं सोचकर मैं भी खुशी-खुशी तैयार हो गया। लेकिन मुझे क्या पता था कि वहीं से मेरे जीवन में एक और अध्याय शुरू होने वाला है। 


शहर की एक दुकान से बहन के लिए गिफ्ट के तौर पर कलाई घड़ी खरीद कर मैं सीधा उसके ससुराल पहुंच गया। उन्होंने काफी अपनापन और खुशदिली से मेरा स्वागत किया। खासकर उसके सास-ससुर का व्यवहार मुझे काफी अच्छा लगा। मुझे वहां देखकर मेरी बहन के खुशी का ठिकाना ना रहा। परन्तु उसके अतिरिक्त एक और अनजान चेहरा था जो मुझे देखकर कमल की भांति खिल गया था।
रात के 11-12 बजे  खाना पीने का दौर चला। सबका हाथ बंटाने और भोजन करने के बाद मैं छत पर टहलने चला गया। भोजन करने के बाद 20-25 मिनट तक टहलना मेरी नियमित दिनचर्या में शामिल है। क्योंकि इससे भोजन पचने में आसानी होती है।

कुछ देर टहलने के बाद मैं छत पर बैठकर मोबाइल में छेड़छाड़ कर रहा था। तभी मुझे किसी के कदमों की आहट सुनाई पड़ी। 
"एक मिनट! सुनिए ना"
मैंने सिर उठा कर देखा तो एक सांवली-सलोनी लड़की धीमे स्वरों में मुझे बुला रही थी। 
"मैं नहीं आऊंगा! आप आईए।" 
मैंने सोचा कि इसी परिवार की कोई लड़की मजाक के इरादे से आई होगी, इसलिए मैंने भी मजाकिया अंदाज में प्रतिउत्तर दिया।
कुछ क्षण प्रतीक्षा करने के पश्चात वह लड़की डरते-डरते मेरे पास आई। 
"यह मेरी दोस्त ने आपके लिए भेजा है।"
यह कहते हुए उसने मेरे हाथों में एक कागज का टुकड़ा थमाया और चलती बनी। मैं आश्चर्य से कभी उस कागज़ को तो कभी उसे जाते हुए देखता रहा।पलक झपकते ही वह अंधेरे में गायब हो गई। 
"पता नहीं क्या है ये!"
 सोचते हुए मैंने उस कागज़ को खोला और मोबाइल का टॉर्च जलाया।
 उसमें एक लड़की की पासपोर्ट साइज फोटो थी और लिखा था.......


क्रमशः
शेष अगले भाग में...

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