heart touching story of a poor boy in hindi - आंखों में आंसू आ जायेंगे

garibi ki kahani in hindi - heart touching story of a poor boy in hindi

garibi ki kahani in hindi
 रिक्शा वाला

हमारे देश की सरकारें हमेशा यहीं साबित करने में लगी रहती है कि हमारे देश में ग़रीबी घट रही है।‌‌‌‌‌ हम आर्थिक विकास और के नये युग में प्रवेश कर रहे है। लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। विश्व बैंक और who की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार पिछले 45 सालों में हमारे देश में गरीबी और भूखमरी साल दर साल बढ़ी है। योजना आयोग भले ही उल्टे-सीधे आंकड़े दिखा कर सच्चाई पर पर्दा डालने की कोशिश करें। किंतु ईट भट्ठों और कारखानों में काम करते बाल मजदूर, अस्पतालों में कुपोषण और इलाज के अभाव में मरते मरीज, रेलवे स्टेशनों और फुटपाथों पर सोएं मजदूर और रिक्शाचालक और खेतों में फांसी लगाकर मरते किसान इसकी गवाही दे ही देते हैं। आज भी बिहार बंगाल, छत्तीसगढ़ और झारखंड जैसे बिछड़े और गरीब राज्यों से लाखों गरीब पुरुष, महिलाएं और बच्चे दिल्ली, पंजाब, महाराष्ट्र और केरल जैसे थोड़े संपन्न राज्यों में घृणित और अपमानजनक परिस्थितियों में मजदुरी करते हैं।यह कोई नहीं जानता कि दो पैसे कमाने के लिए वहां उन्हें किन-किन हालातों का सामना करना पड़ता है। इस कहानी में हमने उनके दुःख दर्द, मजबूरी और परेशानियों को चित्रित करने का प्रयास किया है। और हां यह कहानी काल्पनिक नहीं है। इस कहानी को लिखने से पहले हमने 12 राज्यों की यात्रा की है। उन गरीब मजदूरों के साथ बात की है, उनके साथ रह कर काम किया है और उनके दुःख, दर्द को अनुभव किया है। अतः इसे real life story ही समझें।

 heart touching story about poverty


रिक्शा वाला

रात के बारह बज रहे थे। रघु रिक्शे की पिछली सीट पर लेटा अपने फटे-पुराने चादर से पैरों को ढकने की नाकाम कोशिश कर रहा था। क्योंकि मच्छरों के झूंड नीचे से लागातार हमले किए जा रहे थे। 
"दिनभर अमीर लोग ख़ून चुसते है और रात को ये साले मच्छर।" बड़बड़ाते हुए उसने पैर झटका।
"आह"
अगले ही पल उसकी चीख निकल गई।
उसका पैर साईकिल के हैंडल से टकराया था।
"तुझे तो कब से कह रहा हूं कि एक मच्छरदानी ले ले।"
बगल के रिक्शे पर लेटा बैजू काफी देर से उसके और मच्छरों के बीच हो रहे मुकाबले का मजा ले रहा था।
"हां तो तूं अपने रिक्शे में मच्छरदानी क्यों नहीं लगा लेता।" रघु उसके बेतुके सलाह पर चिढ़ गया।
"अरे मेरे बदन में खून ही कहां है। जो ये कम्बखत चुसेगें।" 60 वर्षीय बैजू करवट लेते हुए बोला।
"उफ"
उसे बातों में उलझा देख एक मच्छर ने सुई चुभो दिया।
"तूं तो सराय में सोने जाता था। वहां क्यों नहीं गया।" बैजू ने पुनः सवाल किया।
"क्या करें चाचा, वह सराय भी चोर उचक्कों का अड्डा बन गया है। कल रात ही किसी ने मेरे पाॅकेट से 500₹ निकाल लिए। दो दिन की कमाई थी। सोचा था कि 1000 पूरा कर के घर भेज दूंगा मगर…
मारे दुःख के रघु बात पूरी ना कर सका। 


"तूं सामने स्टेशन पर क्यों नहीं चला जाता। वहां वेटिंग रूम में पंखा लगा हुआ। नींद अच्छी आएगी।"
रघु को दुखी देख बैजू अपना दुःख भुल गया। 
लेकिन किसी ने टिकट मांगा तो…
रघु को बात पसंद आई किंतु वह डर रहा था।
"अरे इतने रात को कौन पुछता है" कोई पुछे तो बता देना कि सुबह ट्रेन पकड़नी है।"
रघु को ये बात पसंद आई।
लेकिन रात में मेरा रिक्शा कोई ले गया तो!
रघु ने शंका जाहिर की।
अरे जा.. कार और बाइक के में जमाने में तेरा रिक्शा कौन चुरायेगा। वैसे अगर तुझे डर है तो ला.. मैं अपने रिक्शे की जंजीर से तेरा रिक्शा भी जोड़ देता हूं। बैजू ने आश्वस्त किया।
रेलवे स्टेशन बिल्कुल सामने ही चंद कदमों की दूरी पर था। कोयंबत्तूर जंक्शन काफी व्यस्त रेलवे स्टेशन है। रात को 12 बजे भी यात्रियों की अच्छी खासी भीड़ दिखाई दे रही थी। वह प्लेटफार्म के सबसे आखिरी छोर पर एक पंखे के नीचे शाल ओढ़कर लेट गया। लेकिन काफी कोशिश करने के बावजूद भी उसे नींद नहीं आ रही थी।
 पता नहीं मेरा राहुल कैसा होगा, किस हाल में होगा। उससे बात किएं भी एक हफ्ते हो गए। पिछली बार बता रहा था कि कई दिनों से तबियत खराब है। मोबाइल में बैलेंस भी नहीं है कि उसका हालचाल पूछूं।


सोचते-सोचते वह कब नींद का आगोश में समा गया पता ही नहीं चला।
"ओए उठ!"
उसने नींद से बोझिल आंखों को किसी तरह खोला तो देखा कि आर पी एफ का एक जवान हाथ में डंडा लिए प्लेटफार्म पर सोए यात्रियों को जगा रहा था। उसने मोबाइल निकाल कर टाइम देखा तो 1:00 बज रहे थे।
यार अभी-अभी तो नींद लगी थी।
वह उबासी लेते हुए बड़बड़ाया।
अभी वह दुबारा सोने को सोच ही रहा था कि वहीं पुलिसवाला उसकी तरफ आता दिखाई दिया। जो डंडे से बाहर जाने का इशारा कर रहा था। उसे आते देख उसके आस-पास ऊंघाते यात्री जल्दी-जल्दी अपनी चादरें समेटने लगे। रघु ने वहां से भागना ही उचित समझा।
अन्य यात्रियों के साथ वह भी बाहर निकल आया। उसने देखा कि बाहर स्टेशन परिसर में काफी यात्री सोए हुए थे। अधूरी नींद पूरी करने के लिए वह भी उनके बीच चादर बिछाकर सो गया। अभी उसे लेटे कुछ ही मिनट हुए होंगे तभी दो-तीन पुलिस वाले आए और सीटीयां बजाते हुए सभी सोए लोगों को जगाने लगे।
मारे नींद और परेशानी के वह पीड़ा से भर गया।
वह उठा और अपने रिक्शे पर चला आया।
सच कहते हैं लोग, गरीबी की जिंदगी कुत्ते से भी बदतर होती है।
पता नहीं ये कैसा देश है। इससे अच्छा तो हमारा बिहार है। वहां तो अनेकों बेसहारों का ठिकाना रेलवे स्टेशन ही होता है। उसका मन अपने जन्मभूमि के प्रति सम्मान से भर गया। लेकिन अगले ही पल उसकी आंखों के सामने बाढ़ से बर्बाद हुए फसलों का भयावह दृश्य गुजर गया।


"ई साल तऽ लागता धान के रोपनी भी ना होई।"
बाबूजी कल ही धान का बीज लेकर आए थे और आज सुबह उठ कर पिछवाड़े गए तो देखा कि खेतों में बाढ़ का पानी घुस आया था।
"तूऽऽ त हर साल इहे कहत रलऽऽ कि इस साल बाढ़ ना आई,ई का हऽ।"
रघु व्यंग्यात्मक लहजे में बोला।
बाबूजी चुप रह गएं।
वह कहते भी क्या। हर साल वे इसी उम्मीद में खेती करते की इस बार बाढ़ नही आयेगा लेकिन हर साल बाढ़ आकर उनकी उम्मीदों पर पानी फेर देता।

रघु बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले के एक छोटे से गांव का रहने वाला था। छोटा सा वह गांव तीन भागों में बंटा हुआ था। जिसके एक भाग में मुस्लिम, दूसरे भाग में वैश्य और तीसरे भाग में दलित और हरिजन इत्यादि रहते थे। मुस्लिम परिवारों के पास खेती लायक पर्याप्त जमीन थी। उनमें कुछ नौकरीपेशा लोग भी थे। कल मिलाकर वे थोड़े संपन्न थे। हिंदू परिवारों में कुछ के पास थोड़ी बहुत ज़मीन थी तो कुछ के पास बिल्कुल नहीं थी। यूं कहा जाए कि लगभग सभी गरीब ही थे। जिनमें से अधिकांश लोग दिल्ली, केरल पंजाब इत्यादि संपन्न राज्यों में जाकर मजदुरी करते थे तो कुछ गांव के ही अन्य लोगों के खेतों में काम करने अपनी आजीविका चलाते थे। उत्तर भारत गंडक नदी के तटवर्ती इलाकों की जमीन काफी उपजाऊ थी। जिसमें लोग धान, गेहूं, गन्ना और दलहन इत्यादि की खेती करते थे। परन्तु वह क्षेत्र बिहार के बाढ़ प्रभावित इलाके में आता था। जहां हर साल बाढ़ से भारी तबाही होती थी। इस साल तो हद ही हो गई। लोगों को धान के बीज गिराने का भी मौका नहीं मिला और बाढ़ आ गई।
रघु के परिवार में मां-बाप, छोटे भाई, पत्नी और तीन बच्चों के साथ कुल आठ सदस्य थे। ग़रीबी की वजह से रघु ज्यादा पढ़ लिख नहीं पाया था। अतः गांव के अन्य लोगों की तरह वह भी परदेश में जाकर मजदुरी करता। लेकिन उसका सपना था कि उसका छोटा भाई पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बने। इसके लिए रात-दिन वह कड़ी मेहनत करता। कुल मिलाकर जैसे तैसे परिवार का गुजारा चल रहा था। तभी कोरोना महामारी सबके लिए इम्तिहान बनकर आ गया। लॉकडाउन लगने से सभी काम-धंधे प्रभावित हुए। सबसे ज्यादा मार तो गरीबों पर पड़ीं। उनको तो खाने के लाले पड़ गए। रोजी-रोटी चलाने के लिए तक कर्ज लेना पड़ा। जिसके कारण साहूकार का कर्ज भी बढ़ गया। अब उनकी चिंता दोगुनी हो गई। अब परिवार का खर्च चलाए कि साहूकार का कर्ज चुकाए।


"परसों हम बाहर चल जाईब"
रघु हाथ मुंह धोकर पलंग पर बैठते हुए बोला।
कहां चल जाईब?
पत्नी ने जानना चाहा।
"केरल"
टिकट बन गईल बा"
"अभी तऽ बनवा के आव तानि "
काज्ञकरेब उहां जाके"
"देखल जाई,जवन काम मिली ऊ कईल जाई लेकिन अपना परिवार के गरीबी में ना मरे देम।
लेकिन इतना दूर!
अरे अपना गांव के बहुत लोग उहां रहे ला। सूनले बानी उहां दिहाड़ी भी ज्यादा बा।
लेकिन …
"अब रहे दऽ, ज्यादा सवाल जन करऽ। खाना लाओ भुक लागल बा।" वह उखड़ गया।
उषा मनमोस कर वहां से उठ गई।

"भैया, अबकी बार मैं भी चलूंगा आपके साथ"
राहुल इंटरमीडिएट कर चुका था परंतु अभी लॉकडाउन की वजह से स्कूल-कॉलेज बंद होने के कारण कई महीनों से घर पर बेकार बैठा था।
"तूं क्या करेगा वहां जाकर"
मैं, मैं तो कोई भी काम कर लूंगा।
"नहीं तूं घर पर ही रह, यहां भी एक आदमी का रहना जरूरी है।
भैया मैं जानता हूं कि घर की कंडीशन खराब है। आप अकेले क्या-क्या करेंगे। मैं चलूंगा तो आपकी भी कुछ मदद हो जाएगी। आखिर यहां भी तो बेकार ही बैठा हूं।
रघु आगे कुछ नहीं बोल पाया। क्योंकि वह जानता था कि राहुल सच कह रहा था।


तय समय पर उन्होंने ट्रेन पकड़ी और 48 घंटे के लम्बे सफ़र के बाद कोयंबत्तूर उतर गये। रघु का एक रिश्तेदार कोच्चि में राईस मिल में काम करता था। उसने राहुल को अपने पास बुला लिया और अपने साथ हेल्पर में लगा लिया। इधर रघु काम की तलाश में कई दिनों तक भूखा-प्यासा इधर-उधर भटकता रहा लेकिन इस अनजान शहर में कोई मुनासिब का नहीं मिल पाया। इसका मुख्य कारण तमिल भाषा का ना बोल और समझ पाना था।‌ उत्तर भारतीय लोगों को दक्षिण भारत में यहीं समस्या होती है। तभी एक दिन उसकी बैजू से मुलाकात हुई। वह भी बिहार का ही रहने वाला था। उसने ही उसे अपने रिस्क पर रिक्शा दिलाया था। उसे यहां रिक्शा चलाते हुए तीन महीने हो गए थे।

लेकिन रहने का कोई निश्चित ठिकाना नहीं खोज पाया था। एक रिक्शा चालक जो दिनभर में बड़ी मुश्किल 300-400 कमाता हो। उसके लिए 2000₹ के किराए के रूम में मुमकिन नहीं था। ऊपर से खाने-पीने का खर्च भी था। अतः वह दिनभर रिकशा चलाता और रात को एक निजी ट्रस्ट द्वारा निर्मित सराय में जाकर सो जाता। परन्तु आगे का किस्सा तो आप जानते ही हैं।
"अरे कब तक सोयेगा"
बैजू ने झकझोर कर जगाया तो वह नींद की दुनिया से बाहर आ गया। सोचते-सोचते वह पता नहीं कब सो गया था। वह आंखें मलते हुए उठा तो सुबह के आठ बज रहे थे। मच्छरों के काटने से समूचे शरीर में खुजली हो रही थी। शौच भी लग आई थी। उसने चादर को लपेट कर रखा और बोतल में पानी भर कर जंगल की ओर चला गया। वापस आ कर हाथ मुंह धोकर हमेशा की तरह चाय बिस्कुट खाया और रिक्शा लेकर तैयार हो गया। 

रिक्शे पर बैठा वह सवारी का इंतजार कर रहा था। तभी उसका मोबाइल बजने लगा।
"हेलो"
घर का नंबर देखते ही उसने जल्दी से फोन काॅल‌ उठाया। 
"राउर फोन काहे ना लागत रहे, कै दिन से लगावत बानी।"
फोन उठाते ही पत्नी ने शिकायत की।
"बैलेंस खत्म हो ग‌ईल रलऽ, अभी ता रिचार्ज करईनीं हऽ।" माई कहां बिया, ठीक बिया ना।"
फिर उसने बारी-बारी से मां और सभी बच्चों से बात की।
"याद बा की ना, कले किश्ती भरें के बा।"
काफी देर तक पत्नी बच्चों और मां से हाल-चाल उसने फोन रखना चाहा तभी ऊषा ने याद दिलाया। 
"अरे हां! अच्छा आज शाम के हम 1000₹ डाल देम"
"1000₹ ना कम से कम 1500₹ डाल देम काहे कि चावल, आटा, तेल सब खत्म हो गईल बा ऽ।"
ठीक बा, कोशिश करऽ तानि।" कहते हुए उसने काॅल कट कर दिया।
शाम तक 1500₹ का व्यवस्था कैसे होगा।
फोन रखने के बाद वह सोच में पड़ गया।

पिछले साल रमा की शादी में जो उसने 2 स्मॉल फाइनेंस कंपनियों से तीस-तीस हजार के दो लोन उठाए थे।वे उसके जी का जंजाल बन चुके थे। हर महीने 7-8 हजार रुपए उसी में चले जाते थे।
"coming mam" 
काफी देर इंतजार करने के बाद उसे दो महिलाएं अपनी तरफ आती दिखी तो वह झट में सीट से नीचे उतरा और रटा-रटाया डायलॉग मार दिया।
तमिल उसे आती थी इसलिए उसने अंग्रेजी के कुछ लाइन्स याद कर लिए थे। 
 वे दोनों महिलाएं रिक्शे पर बैठने जा ही रही थी कि एक ऑटो आ कर रूकी। ऑटो वाले ने पता नहीं क्या कहा कि दोनों महिलाएं ऑटो में बैठ कर चली गई। वह बेचारा देखता ही रह गया।
इस तेज रफ्तार वाली दुनिया में रिक्शे और टांगें को कौन पूछता है भला।
वह निराश हो कर रिक्शे की पिछली सीट पर बैठ गया और मोबाइल में छेड़छाड़ करने लगा।

ओ रिक्शा! ओ रिक्शा!
उसे किसी के चिल्लाने की आवाज सुनाई पड़ी।
"गांधीपुरम चलोगे"
शायद वह भी कोई उत्तर भारतीय था।
"कितना लोगे"
उस अधेड़ व्यक्ति ने पूछा।
"आइए ना जो सही लगे दे दिजियेगा।"
जब भी उसे कोई हिंदीभाषी मिलता। वह एकदम दरियादिल हो उठता।
रिक्शा चलाने की आदत ना होने के कारण उसके कुल्हों पर फफोले पड़ गए थे। जिससे कारण उसे तीव्र जलन महसूस हो रही थी। ऊपर से बह तेज धूप में वह पसीने से तर-बतर किसी प्रकार दर्द को बर्दाश्त करके पैडल मारता जा रहा था।
"कितने हुए।"
करीब आधे घंटे के सफर के बाद वे गांधीपुरम पहुंच गए।
"वैसे तो यहां का 60₹ बनता है, आप 50₹ ही दे दीजिए।" वह विनम्रता से बोला।
उस अधेड़ ने जेब से 20₹ का नोट निकाला और उसके हाथों में थमा कर जाने लगी।
ये क्या अंकल जी बहुत घाटा लग जाएगा।
"घाटा क्या लगेगा, तेरा क्या पेट्रोल जल गया है।"
लेकिन अंकल जी..
"अरे ठीक है, रख लें।
वह बेरुखी से कहता हुआ आगे बढ़ गया।
रघु का जी चाहा कि वह उस खूसट का मुंह तोड़ दे। लेकिन कुछ सोच कर वह खुन का घुंट पी कर रह गया।
वह रिक्शे पर चढ़ा और वापिस चल पड़ा।

आज का दिन उसके कमाई के लिहाज से अच्छा गुजरा था। दिनभर में करीब साढ़े छः सौ की कमाई हुई थी। और पहले का पांच सौ। लेकिन अभी 400 रूपए कम थै. उसमें से तो दो सौ रुपए रिक्शे का किराया भी देना था। 
"चलो उसे कल ही दो दिन का इकट्ठे दे दूंगा। पहले बैजू अंकल से उधार ले कर भेज देता हूं।"
सोचते हुए वह उठ खड़ा हुआ। बैजू का कोई रिश्तेदार नहीं था। वह बेटी थी। जो दस साल पहले ही किसी लफंगे के साथ भाग गई थी। उसे गांव गए कई साल हो चुके थे। वह दिनभर रिक्शा चलाता और रात को दो पैग मार कर रिक्शे पर पड़ जाता। बैजू से पैसे लेकर उसने घर भेजे, तब जाकर उसे थोड़ा चैन मिला।
रात के लगभग आठ बज चुके थे। अब उसे भूख भी लग आई थी। वह उठा और सामने होटल में घुस गया। ये इडली डोसा और सांभर खाते खाते तो लगता है, घर जाने से पहले ही मर जाऊंगा।
उसने बे-मन से इडली को मुंह में डालते हुए सोचा। सचमुच उसके पिछले तीन महीने से कभी भी भरपेट भोजन नहीं किया।
खाना खाने के बाद वह अपने रिक्शे पर बैठा था तभी उसे कुछ याद आया।
उसने तुरंत मोबाइल निकाल कर काॅल लगाया।

राहुल अभी-अभी ड्यूटी से आकर बिस्तर पर लेटा ही था कि उसका मोबाइल बजने लगा।
"हेलो कौन"
वह मोबाइल की स्क्रीन टूटी होने के कारण नंबर नहीं पहचान पाया।
"हेलो राहुल! कैसा है ये तूं"
"प्रणाम भैया! मैं ठीक हूँ आप कैसे हैं?
राहुल का बुझा हुआ चेहरा खिल उठा।
"अरे फोन क्यों नहीं करता है रे तूं"
रघु ने उसे डांटते हुए बोला।
"मेरे मोबाइल का स्क्रीन टूट गया है। इसमें कुछ नहीं दिखता। बस काॅल सुन सकता हूं।"
"अरे कैसे टूट गया"
"वो काम करते वक्त हाथ से छूट गया।"
राहुल ने बताया।
"अच्छा ठीक है, बनवा लेना। अब ये बता कि काम कैसा है।"
रघु ने जानना चाहा।
कैसा है! ठीक ही है। लेकिन ड्युटी 12 घंटे की है और महीना है केवल 9000₹ हजार। उसमें से भी ठेकेदार का कमीशन कट जाता है।
राहुल मायूसी से बोला। दरअसल उसका वहां बिल्कुल मन नहीं लग रहा था। ऐसा लगता जैसे किसी जेल में कैद हो।
अच्छा कोई बात नहीं, दिवाली तक किसी तरह काम कर लें। उसके बाद फिर मत आना।
रघु ने सांत्वना दी।
लेकिन ठेकेदार कहता है कि दिवाली में कोई घर नहीं जाएगा। जो जायेगा उसे पैसा नहीं मिलेगा।
क्यों उसके बाप का राज है क्या?
हां समझिए उसका ही राज चलता है। कोई उसके खिलाफ कुछ नहीं बोल पाता।
"जरा बात करा तो उससे।"
छोड़िए ना, वो आपसे बात नहीं करेंगा। मैं कोई ना कोई उपाय लगा लूंगा। आप चिंता मत किजिए।" आप बताइए आपका काम कैसा है।
मुझे भी एक फैक्ट्री में अच्छा काम मिल गया। मेहनत भी ज्यादा नहीं है और 10-12 हजार रुपए आराम से बच जाते हैं।
चलिए बहुत अच्छा है।
राहुल खुश होते हुए बोला।
ठीक है, तुम ठेकेदार को बता देना के दिवाली में जाना है। मैं तुम्हारे लिए भी टिकट बुक कर लूंगा। और हां कोई दिक्कत हो तो मुझे किसी के मोबाइल से फोन कर देना, मैं चला आऊंगा।
ठीक है फोन रखता हूं।
अच्छा ठीक है।


फोन एक तरफ रख कर राहुल बिस्तर पर लेट गया। भाई से बात करके आज उसे बहुत सुकून मिला था। वरना फैक्ट्री के शोर-शराबे से तो वह पागल हो उठता था। कल ठेकेदार को साफ-साफ बता दूंगा कि मुझे दिवाली में जाना है। सोचते हुए वह गांव की दिवाली और छठ की पुरानी यादों में खो गया।
कितना अच्छा है, हमारे गांव का जीवन। बस केवल बाढ़ ना आए तो हमें परदेश आने की क्या जरूरत।
भाभी के हाथ की पूड़ी कचौड़ी और मां के हाथ के स्वादिष्ट ठेकुओं की कल्पना करके वह रोमांचित हो उठा। अबकी बार वह मुन्ना और रेशम के लिए ढेर सारे पटाखे खरीदना।‌ उसे अपने भतीजे और भतीजी का ख्याल आया।
गांव की सुनहरी की करते-करते वह जल्द ही नींद की गहराइयों में खो गया।

"ठेकेदार साहब मुझे दिवाली में घर जाना है"
अगले दिन ठेकेदार के मिलते ही उसने अपने दिल की बात कह दी।
"क्या करेंगा दिवाली में जाकर, दिवाली के 15 दिन बाद चले जाना।"
ठेकेदार ने लापरवाही से कहा।
नहीं बरस-बरस के दिन पर मैं घर पर नहीं रहूंगा तो मेरी मां बहुत रोयेगी।
तो फिर क्यों आया, यहां मां के गोद में रहता"
ठेकेदार बेरुखी से बोला। 
"मैं तो किसी भी हाल में जाऊंगा ही।"
तो भी जा, कौन रोकता है। मगर तेरे इस महीने के पैसे नहीं मिलेंगे।
ऐ तो कोई बात नहीं हुई, मैं मालिक से बात करूंगा।
राहुल ने थोड़ी सख्ती से कहा।
"तो फिर जा ना, यहां क्यों खड़ा हो।"
ठेकेदार ने भद्दी सी गाली दी।
अगली सुबह मिल मालिक ने राहुल को अपने ऑफिस में बुलाया और बहुत फटकारा। वो तो शुक्र है अजय का जो समय पर वहां पहुंच गया वरना वह हाथ भी उठा देता।
शायद ठेकेदार ने ही उसको कोई पट्टी पढ़ा दी थी। 
"देखो राहुल समझते की कोशिश करो। हम इनसे झगड़ा करके जीत नहीं सकते।" बस कुछ दिन की तो बात है, दिवाली बाद मेरे साथ ही चले चलना।"
अजय जो राहुल के मौसी का लड़का था और उसका हम-उम्र था।
"यार जब दिवाली छठ बीत ही जायेगी तो जाकर क्या करूंगा" वह बहुत गुस्से में था।
इतना गाली-गलौज सुनने के बाद उसका मन और भी नहीं लग रहा था।
ठीक है, अभी तो दिवाली को एक हफ्ते हैं। मैं बात करूंगा, तुम शांत हो जाओ।
अजय इस फैक्ट्री में बहुत पुराना आदमी था।


दिवाली के ठीक चार दिन पहले उसका टिकट था। अजय ने पता नहीं कैसे बात करके ठेकेदार को मना लिया था। परन्तु ठेकेदार ने उसके हिसाब में से तीन हजार रुपए काट लिए था। राहुल को बड़ी मुश्किल से इस जेल से आजाद होने का अवसर मिला था। इसलिए उसने भी ऐतराज नहीं जताया। रघु ने उसे फोन करके बता दिया था कि एर्नाकुलम से ट्रेन या बस पकड़ कर सीधे कोयंबत्तूर चले आना। वहां से दोनों भाई साथ चलेंगे। पर्व त्योहारों का दिन होने के कारण तत्काल टिकट मिल पाना मुश्किल था। इसलिए उसने बस ही पकड़ ली।
कोयंबत्तूर बस स्टैंड से उतर कर उसने रेलवे स्टेशन के लिए बस पकड़ ली। रघु लाइन पर था और लागातर उसे दिशानिर्देश दे रहा था।
रेलवे स्टेशन के इस पार उतर कर वह मोबाइल कान से लगाए सड़क पार कर रहा था। तभी अचानक एक कार तेज गति से सामने आ गई। लेकिन उससे पहले की कार उसके शरीर को छुती सड़क के उस पार से किसी ने बिजली की फुर्ती से उसके ऊपर छलांग लगाई और उसे दूर ढकेल दिया। यह सब इतनी तेजी से हुआ कि उसे कुछ भी दिखाई नहीं दिया। थोड़ी ही देर में भीड़ जमा हो गई। कार ड्राइवर कार छोड़कर भाग चुका था। रोड पर गिरने के कारण उसकी कोहनियां छिल गई थी।

किसी तरह कराहते हुए वह भीड़ को चीरता हुआ अंदर पहुंचा और मृतक को पहचानने की कोशिश की। उसने दिमाग पर जोर डाला और घने दाढ़ी-मूंछों के खून से सने चेहरे को पहचानने की कोशिश की। अगले ही पल वह शव से लिपट कर दहाड़े मार-मार कर रो रहा था। वह रघु ही था जो सड़क के इस किनारे खड़ा उसका इंतजार कर रहा था। चारों ओर से खड़े लोग अपना-अपना मोबाइल लिए तस्वीरें खीच रहे थे और वह भाई के शव से लिपटा रो रहा था। कुछ ही मिनटों में जब पुलिस आ गई तो सब लोग वहां से खिसकने लगे।
"अरे ये तो वहीं रिक्शा वाला है। जो रेलवे प्लैटफॉर्म पर सोता था।"
किसी पुलिस वाले की आवाज उसकी कानों में पड़ी। यह सुनते ही उसका दिमाग बिल्कुल कोमा में चला गया। फिर कैसे वह शव के साथ घर पहुंचा, कैसे दाह संस्कार हुआ उसे कुछ भी मालूम नहीं।
उसने जब आंखें खोली तो खुद को अस्पताल में पाया। करीब एक हफ्ते बाद वह कोमा से बाहर आया था। मां-बाबूजी, भाभी बच्चे सभी उसके आसपास बैठे थे। जैसे ही उसकी नजर भाभी और बच्चों पर पड़ी वह किसी बच्चे की तरह सुबक-सुबक कर रोने लगा। वह उस दृश्य की कल्पना करके तड़प उठा। जब उसका भाई रिक्शा चलाता होगा। जब वह रेलवे स्टेशनों पर सोता होगा। जब उसके खुबसूरत चेहरे को कार ने रौंदा होगा। वह भाभी के पैरों में गिर कर लागातार रोते ही चला जा रहा था। लेकिन आखिर कोई कब तक रो सकता है। किसी के जाने से जीवन रूक तो नहीं जाता। लेकिन उसने उसी वक्त कसम खायी कि वह तब शादी नहीं करेंगा। जब तक वह अपने भतीजे को पढ़ा-लिखाकर बड़ा आदमी नहीं बना देता और दोनों भतीजियों की शादी नहीं हो जाती। उसने फिर में पढ़ाई चालू कर दी। अब वह दिनभर पास के कस्बे में मजदूरी करता और रात को पढ़ाई करता। दिल लगाकर काम करने के कारण बहुत जल्द ही वह कुशल कारीगर बन गया। जिसके चलते उसे ज्यादा पैसे मिलने लगे और घर की हालत भी सुधरने लगी। लेकिन अभी उसका लक्ष्य पूरा नहीं हुआ था। उसने परिवार का खर्च चलाते हुए पढ़ाई भी जारी रखी। और बच्चों को भी पढ़ाना जारी रखा।

पांच साल बाद

राहुल अब तऽ शादी करबऽ ना।
भाभी ने उसके माथे पर टिका लगाते हुए पुछा।
आज रघु की पांचवीं बरसी थी और इसी मौके पर उसका बिहार पुलिस में दरोगा के पद पर सलेक्शन हो गया था। इसी खुशी में पार्टी दी गई थी। सभी मेहमान आए हुए थे। पूरे परिवार में खुशी का माहौल था। मां और बाबूजी भी बहुत खुश थे।
आखिरकार वे गरीबी के दलदल से बाहर निकल गए थे।"बोलत काहे नईखऽ।"
अबकी बार मां ने उसे टोका।
नहीं भाभी! अभी मेरा काम अधूरा है। अभी मुन्ना को एसीपी बनाना है। अभी किरण और नेहा की शादी करनी है और गांव को ऐसा बनाना है कि किसी को परदेश जाकर मजदुरी ना करनी पड़े
अभी मेरा सफ़र बहुत लंबा है। तब तक आपलोगो को इंतजार करना पड़ेगा।
आप लोग मुझे आशीर्वाद दिजिए कि मुझे अपने सफर में सफलता मिलें।
वह भाभी, मां और बाबूजी के पांव छुते हुए बोला। सभी मेहमानों से निपट कर वह छत पर चला आया। रात के बारह बज रहे थे। चांद पूरी ताकत से चमक रहा था। उसने ध्यान से चांद को देखा तो ऐसा लगा कि रघु मुस्करा रहा है।‌
उसके आंखों से कुछ मोती टूटे और होंठों पर आकर रूक गए। अनायास ही उसकी होंठों से निकल पड़ा।
"भैया आप खुश तो हो ना"
समाप्त
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 धन्यवाद

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