best motivational love story in hindi - क्या यहीं प्यार है- life ka doctor

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मैंने उस letter को पढ़ना शुरू किया। जैसे-जैसे मैं लेटर पढ़ता गया। मेरे होंठों की मुस्कराहट के साथ-साथ मन की उलझन भी बढ़ती चली गई। शायद कोई लड़की मुझे बिना देखे, बिना जाने कई सालों से प्यार करती थी। सिर्फ प्यार ही नहीं करती थी बल्कि वह मन ही मन मुझे अपना पति भी मान चुकी थी उसने ये भी लिखा था कि अगर मैंने उसका प्रेम स्वीकार नहीं किया तो वह ....

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  एक गरीब लड़के की दिल को छू लेने वाली मोटिवेशनल कहानी

क्या यहीं प्यार है 

क्या हुआ मां "
मैंने बेचैनी से मां से पूछा।
मां खामोश रही।
परंतु उसकी आंखों मे झलकती मायूसी सब कुछ बयां कर रही थी।
बेयकीनी से मैंने मां को देखा और बाबूजी के कमरे की तरफ बढ़ गया।
"क्या हुआ बाबूजी, क्या कहां उन्होंने"
मैंने बाबूजी के पैरों के पास बैठ गया।
"बस तुम जो चाहते थे वह हो गया ना"
"करवा दी ना मेरी बेइज्जती"
"और कोई कसर बाकी रह गई हो तो उसे भी पूरा कर ले।"
बाबूजी की आवाज में दुख और नाराजगी साफ झलक रही थी।
"कहां क्या उन्होंने"
मैं पूरी बात सुनना चाहता था।
"उनका कहना है कि हम एक भिखमंगे के घर अपने बेटी की शादी कभी नहीं करेंगे।"
यह सुनते ही मेरा मन गुस्से और नफ़रत से भर गया।
उस दिन मुझे एक बात और सीखने को मिली‌ थी।
प्यार और गुस्सा दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू होते हैं। नफ़रत को प्यार में और प्यार को नफरत में बदलने में एक क्षण भी नहीं लगता। हमारे प्यार और नफ़रत विचारों, शब्दों और परिस्थितियों के दास होते हैं। 

"बस बहुत हो गया"
मैं कल खुद वहां जाकर उनका गुरूर तोड़ता हूं।
बिल्कुल ठीक, जा और अपने बहन का घर उजाड़ दें।"
गुस्से और अपमान की आग में मैं भुल गया था कि मेरी एक और गलती से मेरे बहन की खुशियां तबाह हो सकती थी।
किंतु बाबूजी को इस बात का एहसास था।
"तो क्या करूं मैं"
"अब तूं वहीं करेगा जो मैं कहूंगा। हम अगले महीने ही तेरी शादी करके उनके अपमान का जवाब देंगे"
बाबूजी के सब्र का बांध टूट गया।
"नहीं मैं किसी और से शादी नहीं कर सकता।"
कहकर मैं वहां से उठ गया।
अगले दो-तीन दिनों तक घर में इस बारे में कोई बात नहीं हुई।
मुझे भी परिस्थिति की गंभीरता का एहसास था इसलिए मैं भी किसी तरह अपने दिल को समझाने की कोशिश कर रहा था। 
मुझे तो बस इसी बात की चिंता थी कि उस बेचारी लड़की पर क्या-क्या बीत रही होगी।‌‌ उसके घरवाले उस मासूम लड़की के साथ क्या सलूक कर रहे होंगे।
यहीं सोचते हुए मैंने उसके एक पड़ोसी को को काॅल किया। उससे मेरी अच्छी-खासी जान पहचान थी। कभी-कभार जब मेरे बहनोई का फोन नहीं लगता तो मैं उसी के मोबाइल पर काॅल किया करता था। दुआ-सलाम करने के बाद मैंने उसके घरवालों से बात करने की इच्छा जाहिर की। शायद किसी जरूरी काम में उलझे होने के कारण उससे अभी बात कराने में असमर्थता जाहिर की और अगले दिन बाद कराने का वादा किया।

आजकल घर में मेरा मन बिल्कुल नहीं लगता था। अतः मैं प्रतिदिन नाश्ता कर के घर से निकल जाता और दिनभर बच्चों के साथ क्रिकेट खेलता। फिर सुरज डुबने के बाद ही घर वापस आता। मेरे पास
दिल बहलाने का बस यहीं एक जरिया था।
अक्टूबर का महीना था। सुरज की मद्धम किरणें सर्दियों के आने का निमंत्रण दे रही थी। रोजाना की तरह दूब की मखमली घास पर टहलते हुए मैं अपनी किस्मत को कोस रहा था। तभी मोबाइल बज उठा।
"हेलो.. हेलो... हेलो 
स्क्रीन पर उसका नंबर देखते ही मैंने फ़ौरन काॅल उठाया।
"अच्छा किया ना आपने"
कुछ देर की खामोशी के बाद उसकी नाराजगी भरी आवाज सुनाई पड़ी।
"क्या बात है, क्या किया है मैंने"
"जानबूझकर कर अनजान बनने की कोशिश मत किजिए।"
उसके शिकायती लहजे में कहा।
"मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा है कि तुम क्या कह रही हो।"
आज पहली बार उसकी आवाज में प्यार और अपनापन की कमी महसूस हो रही थी।
"मैंने तो आपसे कहा था कि हमारे प्यार के बारे में कभी किसी और को मत बताइएगा। फिर आपने उस कमीने को क्यों बताया। उसने मेरे घर आकर सबके सामने मेरे इज्जत की धज्जियां उड़ा दी है।
ओह! अब मुझे याद आया। कल रात मैंने उसके पड़ोसी से जो बात की थी। वह उसी की बात कर रही थी।
"परंतु मैंने तो उसे खुद से कुछ नहीं बताया। उसे तो यह बात पहले ही कहीं से पता चल गया था। वह कह रहा था कि मुझे पता चला है कि आपका उसके साथ चक्कर चल रहा है। फिर मैंने कहा कि नहीं यह बात बिल्कुल गलत है। ऐसी कोई बात नहीं है। फिर उसने कहा, देखिए झुठ मत बोलिए। मैं सब जानता हूं। अगर आप मुझे अपना दुश्मन समझते हैं तो मत बताइए। मैं तो आपको अपना दोस्त समझता था इसलिए मैं सोच रहा था कि अपनी तरफ से आपकी कुछ मदद करूं। फिर मैंने सच स्वीकार कर लिया।

मैंने संक्षेप में कल रात उसके साथ हुई बातचीत का सारा ब्योरा कह सुनाया।

"बहुत अच्छा किया आपने, अब मेरी एक और बात सुन लीजिए।आज के बाद हमारा और आपका रिश्ता खत्म। आज के बाद ना ही मुझसे संपर्क करने की कोशिश मत किजियेगा और ना ही आप मेरे घर आइएगा। आपको मेरे और मेरे प्यार की कसम है।
यह कहते हुए उसने काॅल डिस्कनेक्ट कर दिया।

मैं बस मोबाइल कान से लगाए खड़ा का खड़ा ही रह गया। पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए। दिमाग जैसे बिल्कुल सुन्न हो गया। समझ में नहीं आया कि क्यां करूं कहा जाऊं। एक पल में मेरी सारी दुनिया उजड़ चुकी थी।‌‌‌‌ पता नहीं लोग एक पल में इतने स्वार्थी कैसे हो जाते हैं जो अपनी गलतियों पर परदा डाल कर दुसरे को दोषी ठहरा देते हैं
कुछ पल तक यूं ही बिना हिले खड़ा रहा और अगले ही पल निढाल होकर धम्म से जमीन पर गिर पड़ा।
 "मैं कसम खाती हूं कि जिंदगी में कभी भी आपका साथ नहीं छोडूंगी। मैं अपने प्यार की कसम खाती हूं। अपने मां बाप की कसम खाती हूं कि आपके सिवा किसी और से शादी नहीं करूंगी।"
कहीं बहुत दूर शुन्य में उसकी आवाज गूंजती हुई सुनाई पड़ रही थी। अगले ही पल मेरी आंखों के सामने बीते हुए कल की सारी यादें किसी फिल्म की भांति घुमने लगी।

यह मेरी दोस्त ने आपके लिए भेजा है।"
यह कहते हुए उसने मेरे हाथों में एक कागज का टुकड़ा थमाया और चलती बनी। मैं आश्चर्य से कभी उस कागज़ को तो कभी उसे जाते हुए देखता रहा। पलक झपकते ही वह अंधेरे में गायब हो गई। 
"पता नहीं क्या है ये!"
 सोचते हुए मैंने उस कागज़ को खोला और मोबाइल का टॉर्च जलाया।
 उसमें एक लड़की की पासपोर्ट साइज फोटो थी और एक पत्र भी था।
"पता नहीं किसने और क्यों भेजा है"
हैरानी का भाव लिए मैंने उस पत्र को पढ़ना शुरू किया। जैसे-जैसे मैं पत्र पढ़ता गया। मेरी उलझन भी बढ़ती गई। शायद मेरे बहन के ससुराल की ही एक लड़की मुझे बिना देखे, बिना जाने, सालों से प्यार करती थी। सिर्फ प्यार ही नहीं करती थी बल्कि वह मुझे अपना पति भी मान चुकी थी उसने ये भी लिखा था कि अगर मैंने उसका प्रेम स्वीकार नहीं किया तो वह जहर खा कर आत्महत्या कर लेगी। 
दुध का जला छाछ भी फूंक-फूंक कर पीता है। मैं तो पहले से ही अधूरे प्रेम की आग में जल रहा था।

मुझे उस लड़की या उसके प्रेम प्रपोजल में कोई दिलचस्पी नहीं थी। परन्तु वह पत्र इतने भावनात्मक और दर्दनाक एहसास के साथ लिखा गया था कि मैं सोच में पड़ गया।
प्रेम का ताप तो एक पत्थर दिल इंसान को भी पिघला देता है। मैं तो ठहरा एक नर्म दिल आदमी।
एक भोले-भाले दिल के सच्चे इंसान पर अगर कोई इतना इमोशनल अटैक करे तो कुछ ना कुछ तो असर होना ही था।
कहीं यह पागल लड़की कोई गलत कदम ना उठा ले इसलिए मैंने तय किया कि जब वह मिलेगी तो उससे बात करके उसे समझा दूंगा। अगले दिन शाम को मैं वापस आने के लिए तैयार हो रहा था तभी एक लड़की ने मेरे हाथों में एक कागज का टुकड़ा थमा दिया। 
"मैं पुराने घर पर जा रही हुं। जाने से पहले मुझसे मिल कर जाइएगा।" पहली बार मैंने उसे गौर से देखा। सांवली सलोनी मासूम सुरत और गहरी काली आंखों वाली वह पागल लड़की अपनी आंखों में कई राज छुपाए हुए थी। 
मेरी बहन के ससुर ने कल ही मुझे अपना पुराना घर दिखाया था। शादी का माहौल था इसलिए घर के सभी सदस्य नये वाले घर पर थे। नयी-नयी रिश्तेदारी था इसलिए थोड़ा डर भी लग रहा था। कहीं किसी ने उसके साथ देख लिया तो इज्जत तो जाएगी ही रिश्तेदारी भी खराब हो जाएगी। 
लेकिन उसे समझाया भी जरूरी था इसलिए मैंने उससे मिलना ही उचित समझा। मैं उससे जा कर मिला और उसे हर तरह से समझाने की कोशिश की। लेकिन नादान और पागल लड़की समझने को तैयार ही नहीं थी। जब मैंने थोड़ा सख्ती दिखाई तो वह मेरा हाथ पकड़ कर फूट-फूट कर रोने लगी।
 "ठीक है, मुझे सोचने के लिए थोड़ा टाइम चाहिए।" कहकर मैंने उससे पीछा छुड़ाया और घर वापस आ गया। 

घर आकर मैं दिनभर उसके बारे में ही सोचता रहा। शायद उसकी मासुम आंखों से निकले आंसुओं के सच्चे मोती मेरे दिल में अपने लिए जगह बना चुके थे। मैंने महसूस किया कि मेरे उजड़े और विरान दिल में भी उसके प्यार के अंकुर फुट रहें हैं। लेकिन मैंने दिल को कड़ा करके ये फैसला कर लिया कि "नहीं" एक बार उस रास्ते पर ठोकर भा चुके हैं। अब दुबारा उस रास्ते से नहीं गुजरना। 

इसे एक संयोग ही कहा जाएगा कि मेरे फ़ोन का चार्जर वहीं पर छुट गया था। अतः मुझे जल्दी ही वहां दुबारा जाना पड़ गया। वहां जाने से पहले मैंने एक लंबा-चौड़ा पत्र लिखा। जिसमें मैंने गरीबी-अमीरी, ऊंच-नीच, दुनियादारी और अपनी मजबूरीयों को विस्तार से अभिव्यक्त किया था। उसमें मैंने अपने पहले प्यार के बारे में भी जिक्र किया था। वहां पहुंचने के पर सबसे पहले मैंने मौका देखकर पत्र उसके हवाले किया। और भोजन करने के बाद वहां तुरंत निकलना चाहा। परंतु मेरी बहन उसके ससुराल वालों ने जिद करके मुझे रोक लिया।
मम्मी-पापा यानी मेरी बहन के सास-ससुर मुझे अपने बेटे से भी ज्यादा प्यार करते थे। अंततः मुझे मजबूरन रूकना ही पड़ा। दिन भर मैं वहां रहा और शाम को लौट आया। घर आकर मैंने वह पत्र निकल कर कर पढ़ने लगा जो उसने चुपके से मेरे पैकेट में डाल दिया था। 
उसनेे लिखा था कि मुझे गरीबी-अमीरी , ऊंच-नीच और दुनियादारी से कोई मतलब नहीं है। और ना ही मुझे आपकी पिछली जिंदगी से मतलब है। मुझे रुपए-पैसे, सोना-चांदी और महल भी नहीं चाहिए। मुझे बस आपका साथ चाहिए। मैं आपके साथ झोपड़े में रहने को भी तैयार हूं। आप एक बार मेरा प्यार स्वीकार कर लिजिए। मैं आपको इतना प्यार दूंगी कि आप उसके दिए हुए सारे दर्द और गम भुल जाएंगे।

उस समय मैं भी उतना अनुभवी और परिपक्व नहीं था कि सही निर्णय ले सकूं। अतः जिस उम्र में मुझे अपने कैरियर बिल्ड करना चाहिए। तरक्की और सफलता को अपना लक्ष्य बनाना चाहिए था। उस उम्र में मैंने दुसरी बार मोहब्बत को अपने जीवन लक्ष्य बना लिया। और जो गलती मैंने कि थी वहीं गलती आजकल के युवा पीढ़ी के ज्यादातर लड़के-लड़कियां करते हैं। वे उन लोगों के प्यार भरी बातों में फिसल जाते हैं। जिन्हें ना तो प्यार का मतलब पता है और ना ही दुनियादारी की समझ। फिर बाद में जब उन्हें धोखा या जुदाई मिलती है तो उसके गम में अपना अमूल्य जीवन बर्बाद कर लेते हैं। इसलिए मैं आजकल के लड़कों और लड़कियों को ये संदेश देना चाहता हूं कि किसी के चेहरे की सुंदरता पर मोहित होकर अथवा भावनाओं में बहकर प्यार-मोहब्बत के चक्कर में ना पड़े। मैं ये नहीं कहता कि प्यार करना गलत है। इसलिए किसी से कोई प्यार ना करें। मेरे कहने का अभिप्राय यह है कि प्यार बहुत ही पवित्र और ऊंची चीज है। प्यार का अर्थ लाखों में से कोई एक ही जानता है। इसलिए अगर प्यार हो ही जाए तो सबसे पहले प्यार का सही अर्थ समझ लें। आजकल जो प्यार के फूल खिल रहे हैं वह असली नहीं बल्कि कागज के फूल है। 

खैर आईए कहानी में आगे बढ़ते हैं।
तो हुआ यूं कि मैंने उसका प्रेम स्वीकार कर लिया। फिर जैसा कि सब जानते ही हैं, छुप-छुपकर मिलने-मिलाने,कसमे-वादे खाने और प्रेम-पत्रों के आदान-प्रदान का सिलसिला शुरू हो गया। उसके प्यार की मरहम से मेरे दिल पर लगे पुराने ज़ख़्म ठीक होने लगे। प्यार हुआ तो शादी के सपने भी दिखने शुरू हो गए। शादी होगी, फिर बच्चे होंगे, फिर उनकी पढ़ाई लिखाई, कपड़े और बाकी खर्चें …. 
अचानक मुझे याद आया कि अभी तो मैं बेरोजगार हूं क्योंकि ड्राइवर का काम तो मैं छोड़ चुका हूं। फिर तो कोई और जाॅब ढूंढना होगा। अब मैं जाॅब के चक्कर इधर-उधर धक्के खाने लगा। परन्तु आप तो जानते ही हैं कि अपने देश में जाॅब मिलना कितना मुश्किल है। और वह भी एक कम पढ़े-लिखे साधारण आदमी के लिए।
जाॅब के चक्कर में मैं कई बार ठगी का शिकार भी हुआ। थक-हारकर कर मैंने बिजनेस में हाथ आजमाने का निर्णय लिया। नेपाल की राजधानी काठमांडू में मेरा एक दोस्त फल बेचने का काम करता था। मैं उससे पास चला गया और उसके साथ फल बेचने लगा। वहां गए अभी महीना भर ही नहीं हुआ था कि मेरी जिंदगी में फिर से तुफान आ गया। एक दिन अचानक उस लड़की का काॅल आया। उसने रोते हुए बताया कि मम्मी पापा को हमारे प्यार के बारे में पता चल गया है। वे मुझे बहुत टार्चर कर रहे हैं। आप जल्दी से चले आइए। मैंने अगले दिन ही गाड़ी पकड़ी और घर वापस आ गया। और मैं किसी तरह से उससे संपर्क करने की कोशिश करने लगा। लेकिन कोई संपर्क सुत्र दिखाई नहीं दे रहा था। उसका घर मेरे घर से 30 किलोमीटर की दूरी पर था। वह फोन भी pco से करती थी क्योंकि उस समय मोबाइल भी उतना चलन नहीं था।अब मेरे पास सिवाय उसके काॅल का इंतजार करने के और कोई उपाय ना था। मैंने सोचा कि 1-2 दिन इंतजार कर लिया जाए। उसके बाद कुछ सोचा जाएगा।


अगले ही दिन मेरी बहन का काॅल आ गया। मैंने तुरंत काॅल रिसीव की। 
"भैया आपने मेरे साथ ऐसा क्यों किया। आपको प्यार करने के लिए और कोई घर नहीं मिला। जो आपने मेरा बसा बसाया घर उजाड़ने पर तुले हुए हैं। मेरे ससुराल वाले आपकी गलती के लिए मुझे भी दोषी ठहरा रहे हैं और मेरे साथ दुर्व्यवहार कर रहे हैं।"
 
वह रोते-रोते बोले चली जा रही थी और मैं जड़वत सुने जा रहा था। उसके चुप होते ही मैंने उसे समझाने की कोशिश की लेकिन उसके काॅल काट दिया। काॅल डिस्कनेक्ट होने बाद मैंने फैसला कर लिया कि कल उसके घर जाऊंगा और उनसे बात करूंगा। परन्तु रात में उसकी सहेली (जिसने पहली बार मुझे पत्र दिया था) का काॅल आ गया। 
"उसके घरवाले उसकी शादी कहीं और करना चाहते हैं। आप जल्दी से अपने घरवालों के उसके घर रिश्ते के लिए भेज दिजिए। और हां आप मत आइएगा। वरना बात और बिगड़ जाएगी।
बस उसने इतना ही कहा और फोन रख दिया।
मैंने अपनी मां को सारी बात बताई और बाबूजी को उसके घर भेजने को कहा। बाबूजी हमे बहुत प्यार करते थे परंतु उनको ये बात पसंद नहीं आईं कि वे लड़की वाले के घर रिश्ता मांगने जाएं। मां और बुआ ने उनको मनाने की कोशिश की। पर वे तैयार नहीं हुए। मैंने भी उनसे साफ कह दिया कि अगर उसकी शादी कहीं और हो गई तो मैं किसी और से शादी नहीं करूंगा।

हमारे गांव देहातों में यह परंपरा है कि पहले लड़की वाले लड़के वालों के घर रिश्ता मांगने जाते हैं। लड़के वालों को पहले लड़की वालों के घर जाना अपनी शान के खिलाफ समझा जाता है। आखिरकार मां, बुआ, और दीदी के काफी समझाने बुझाने के बाद वे मेरी खातिर वहां जाने को राजी हो गए। 
पर उन्होंने ये शर्त रखी कि वे केवल एक बार ही बोलेंगे। अगर उन्होंने ना कर दी तो तुम्हें भी मेरी बात माननी होगी।
उनके जाने के बाद मैं निश्चिंत हो गया। मुझे पूरा विश्वास था कि वे लोग ना नहीं करेंगे। क्योंकि उसके मम्मी पापा मुझे बहुत पसंद करते थे। मम्मी कहती थी, "भगवान करे कि अगले जन्म में मुझे आपके जैसा बेटा मिलें।" पापाजी कहते थे, "बाबू, आप गली में घूमने मत जाओ। नहीं तो किसी की नजर लग जाएगी।" 
(वाकई मैं खुबसूरत ही इतना था कि जहां भी जाता, वहां सब मुझे ही देखते थे।)
उस दिन मेरा पूरा दिन इसी बेचैनी में गुजरा कि पता नहीं क्या होगा। कभी कोई बूरा ख्याल दिल में आता तो ख्वाब हकीकत में तब्दील होते नजर आते। 
शाम को जब बाबूजी घर आए तो उनका चेहरा बुझा हुआ था। वे सीधे कमरे में गए और चुपचाप बिस्तर पर लेट गए। मैंने आंखों ही आंखों में मां को इशारा किया। मां फौरन उनके पीछे-पीछे गई और
कुछ ही समय में मां वापस आ गई। 
 
"अरे रात को यहीं सोयेगा क्या। उठ के देख तो कितना अंधेरा हो चुका है।"
अभी मैं आगे बोलने ही वाला किसी के झंकझोने से यादों का सिलसिला टूट गया। आंखें खुली तो सचमुच बहुत अंधेरा हो चुका था। आलस के मारे उठने का मन तो नहीं कर रहा था परंतु बदन पर इतने मच्छर चिपके हुए थे कि मजबूरन उठना ही पड़ा।
आहिस्ता से उठकर मैंने अपने कपड़े झाड़े और थके-हारे कदमों से घर की ओर चल पड़ा।

क्या यहीं आजकल का प्यार है?
प्यार भी उसने किया। इजहार भी उसने किया। 
उसी की गलती से love latter पकड़ें
गए। उसी की वजह से मेरे बाबूजी को अपमान का घूंट पीना पड़ा। उसी की वजह से उसके मम्मी-पापा (जो मुझे अपने बेटे से भी ज्यादा प्यार और सम्मान देते थे) मुझसे नफरत करने लगे हैं। और उसने सारा दोष मेरे ऊपर ही डाल दिया। मेरी तो बस इतनी ही गलती थी कि मैंने एक सच्चा इंसान होने के नाते हमदर्दी में उसका प्रेम कुबूल कर लिया था। मुझे क्या पता था कि वह इतनी खुदगर्ज और बेवफा निकलेगी। वैसे कुछ गलती मेरी भी है। मुझे उसका प्यार स्वीकार ही नहीं करना चाहिए था। उसी पल जाकर उसके मां-बाप से सारी बात बता देना चाहिए था। चलते-चलते मैं सोचता जा रहा था। मन में दुःख और गुस्से के भाव एक साथ आ रहें थे।
इस समय उस पर इतना गुस्सा आ रहा था कि अभी सामने आ जाती तो मारे थप्पड़ के उसके दोनों गाल सुजा देता। ऐसी सजा देता के जिंदगी में कभी प्यार का नाम नाम लेती। 
लेकिन नहीं मैं उसे इतनी आसानी से छोड़ूंगा नहीं..
मैंने चलते-चलते एक फैसला कर....
..क्रमशः..
                    शेष अगले भाग में


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