velentine's day special- क्या प्रेम करना पाप है, क्या प्रेम करना गुनाह है‌

 velentine's day special massage for couples

velentine's day special
is love a sin?

"पोथी पढि पढि जग मुआ, पंडित भया ना कोय, ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय।

संत कबीर के मुंह से इस दोहे को निकले करीब 700 साल हो चुके हैं। परंतु आज तक लोग इसका अर्थ नही समझ सके हैं। तोते की तरह वेद पुराणों को रटने वाले हमारे पंडित पुरोहित भी अभी प्रेम को समझ पाए हैं। इसलिए वे भी प्रेम को पाप साबित करने पर तुले हुए हैं। दरअसल आजकल लोगों ने प्रेम के नाम पर इतना कचरा फैला दिया हैं कि इस पर सवाल उठना लाजिमी है। जैसे- क्या प्यार करना पाप है? क्या प्यार करना गुनाह है? क्या प्यार करना ग़लत है। आइए इस आर्टिकल में इन्हीं सवालों के जबाव ढूंढने की कोशिश करते हैं।


 क्या प्रेम करना पाप है? kya pyar karna paap hai


"प्रेम"  जिसे भगवान कृष्ण ने अपने हृदय में सर्वोच्च स्थान दिया है। जीजस ने जिसे परमात्मा का नाम दिया है। बुद्ध ने जिसे मोक्ष का द्वार कहा है।‌ उस प्रेम को आज लोगों ने इतना नीचे गिरा दिया है, इतना दूषित कर दिया है कि उसे आज हर जगह निंदा अपमान और बदनामी का सामना करना पड़ रहा है। कोई कहता है कि प्रेम धोखा है। कोई कहता है कि प्रेम केवल दर्द और गम है। कोई कहता है कि  प्रेम बदनामी है। तो कोई कहता है कि प्रेम बर्बादी है। जितनी मुंह है उतनी बातें। परन्तु जो लोग ऐसा कहते हैं। उनलोगों के लिए ग़ालिब का ये नज़्म बिल्कुल सटीक बैठता है।

 "उम्र भर ग़ालिब यही भूल करता रहा धूल चेहरे पर थी और आईना साफ करता रहा।"


दोस्त, प्रेम ग़लत नहीं है बल्कि आपके सोचने का नजरिए ही गलत है। आपने अभी प्रेम को जाना ही नहीं है। आपने प्रेम को समझा ही नहीं है। आप किसे प्रेम समझते हैं। किसी स्त्री या पुरुष के रुप रंग को देख कर आपके अंदर जो केमिकल रिएक्शन होता हैं। क्या आप उसे प्रेम समझते हैं। अरे वह कहां प्रेम की बराबरी करेगा। कहा राजा भोज और कहां गंगू तेली। वह बस एक शारीरिक आकर्षण है। ये जो आप किसी के रूप, रंग या धन दौलत पर आसक्त होकर उसे हासिल करने की चाहत करते हैं। इसमें तो आपकी स्वार्थ और वासना दिखती है। इसमें प्रेम कहां है। जरूर आपने प्रेम का मुखौटा लगा कर ऐसा ही कुछ किया होगा। आजकल अधिकांश लोग तो ऐसा ही करते हैं।

"प्यार या परिवार" दोनों में से किसी एक को चुनना पड़े तो आपको किसे चुनना चाहिए


मैंने देखा है आजकल के प्रेमी-प्रेमिकाओं को।

जो देश के नेताओं की तरह पार्टी बदलते रहते हैं। जरा सी बात इधर उधर हो जाए तो तुरंत शिकवा शिकायत‌ शुरू हो जाती हैं।  प्रेम कब घृणा का रूप ले लेता है पता ही नहीं चलता। कोई किसी दूसरे से हंस कर बात कर ले तो प्रेम तुरंत ईर्ष्या और नफ़रत बन जाता है? प्रेम इतनी जल्दी नफरत कैसे बन सकता है? और अगर प्रेम नफरत बन सकता है तो कैसा प्रेम! प्रेम कभी भी नफरत नहीं बन सकता। और जो नफरत बन जाता है, घृणा बन सकता है, वह प्रेम तो हो ही नहीं सकता। वह तो कुछ और होगा। वह आपकी कोई स्वार्थ या कोई महत्वकांक्षा थी। जो सफल ना हो सकी। इसलिए तो आपको गुस्सा आता है। इसलिए तो आपको दुःख होता है।



कोई आपके प्रेम को अस्वीकार कर दे या शादी से इंकार कर दे तो आप जोर जबरदस्ती पर उतर आते हो। मरने मारने पर उतारू हो जाते हो क्या यही प्रेम है। प्रेम तो जीवन देता है। प्रेम तो दूसरो के लिए  अपनी खुशी को भी न्यौछावर कर देता है। प्रेम तो त्याग और समर्पण होता है। आप तो प्रेम के नाम एक दूसरे का शोषण कर रहे हो। प्रेम के नाम पर एक दूसरे को गुलाम बनाना चाहते हो। यह प्रेम कैसे हो सकता है। प्रेम तो स्वतंत्रता है। आजकल प्रेम के नाम पर बड़ी राजनीति‌ हो रही है। बस किसी से आई लव यू कह दो और अपने जाल में फंसाकर अपना मतलब पूरा कर लो। आजकल प्रेम के नाम पर यहीं सब चल रहा है। आपके प्रेम में भी शायद यही सब चल रहा होगा।

शायद आपके प्रेम में कीचड़ मिला होगा। शायद आपने ही अपने प्रेम में कूड़ा करकट डाल दिया होगा। तभी आपको हीरा दिखाई नहीं दिया होगा। वरना प्रेम तो कल भी हीरा था और आज भी हीरा है। एकदम 24 कैरेट। बिल्कुल शुद्ध।

हां आपने जो किया होगा वह प्रेम नहीं कुछ और ही होगा। शायद प्रेम के नाम पर कूड़ा कचरा ही होगा।


love और study दोनों में से कौन सबसे ज्यादा important है?


मै जानता हूं कि मेरी बातें आपको कड़वी लग रही होगी मगर यह बात मैं ऐसे ही नहीं कह रहा हूं। बल्कि मैंने प्रेम को अनुभव किया है। प्रेम को उसकी गहराई से समझा है। उसके खूशबू को महसूस किया है। उसकी पवित्रता को जीया है। और मेरा अनुभव यहीं कहता है कि प्रेम पाप नहीं है। प्रेम पाप हो ही नहीं सकता क्योंकि प्रेम यदि पाप है तो संसार में पुण्य क्या होगा। प्रेम यदि पाप है तो श्रद्धा भी पाप मानी जायेगी क्योंकि श्रद्धा प्रेम का ही दूसरा रूप है। प्रेम यदि पाप है तो भक्ति भी पाप है क्योंकि भक्ति भी प्रेम की ही अभिव्यक्ति है। प्रेम यदि पाप है तो ममता भी पाप है क्योंकि यह भी प्रेम का ही दूसरा रूप है। प्रेम यदि पाप है, तो सारी दुनिया पापी मानी जायेगी हैं क्योंकि यहां हर कोई किसी ना किसी को प्रेम करता ही है। कोई पत्नी को प्रेम करता है, कोई मां बाप को, कोई बेटे को, कोई भाई को, कोई मित्र को। भक्त भगवान को और भगवान भी तो भक्तों को प्रेम करते हैं। यहां जितने संबंध हैं, वे सारे संबंध ही किसी न किसी अर्थ में प्रेम के संबंध हैं। ऐसे तो सारा संसार पाप से भर जायेगा। जरूर आपके समझ में कोई गलती है। जरा ठीक से समझो। जरा प्रेम को अनुभव करो। फिर आपको पता चल जाएगा कि प्रेम साधारण नहीं है, असाधारण घटना है। इस धरती पर जो स्वर्ग जैसा प्रतीत होता है, उसी का नाम प्रेम है। इस अंधेरे जीवन में रोशनी की जो थोड़ी सी किरण दिखाई देती है उसी का नाम प्रेम है। प्रेम पाप नहीं है ‌बस आपने प्रेम को समझने में थोड़ी भूल कर दी है। इसे आप जितना जल्दी सुधार लो उतना ही अच्छा है। 

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