प्यार में हत्या और आत्महत्या क्यों ? why suicide and murder in love.

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सुना था कि प्यार इंसान को जीना सिखाता है। प्यार इंसान के जीवन को खुशियों से भर देता है। परंतु ये कैसा प्यार है। जो मरना और मारना सीखाता है। ये कैसा प्यार है। जो इंसान की जिंदगी को विरान बना कर उसे घुट-घुट कर जीने पर मजबूर कर देता है।‌ सुना था कि प्यार जिंदगी है। इबादत है। जो इंसान को भगवान बना देता है। लेकिन ये कैसा प्यार है। जो इंसान को शैतान बना देता है।‌ जो इंसान को सुसाइड, मर्डर और रेप जैसे जघन्य अपराध करने पर मजबूर कर देता है।‌ आखिर प्यार में हत्या और आत्महत्या क्यों?


प्रेम प्रसंगों में हत्या और आत्महत्या

टाईम्स आफ इंडिया की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार पिछले कुछ सालों में जितने लोग प्यार के कारण मरे हैं उतने लोग तो आतंकवाद की वजह से नहीं मरे हैं। अगर हम एक बार आंकड़ों पर नजर डालें तो दुनिया में हर साल 4 से 5 लाख लोग प्यार में हुए हिंसा की वजह से अपनी जान गंवा बैठते हैं। इसके अलावा लाखों लोग डिप्रेशन और एंजाइटी में घुट-घट कर जीते हैं, लाखों लोगों की जिंदगी बर्बाद हो जाती है और लाखों लोग इससे बाहर निकलने के लिए नशे के शिकार हो जाते हैं। कुल मिलाकर मानवता को जितनी क्षति नफरत से नहीं हो रहा है उतनी प्यार की वजह से हो रहा है। इसलिए आज हम इसी टापिक पर बात करेंगे कि जिस प्यार को ईश्वर का सबसे प्यारा उपहार माना जाता है। आज वह सबसे बड़ा अभिशाप क्यों बन गया है। आखिर प्यार में हत्या और आत्महत्या क्यों हो रही है।


देखिए प्यार की बातें तो सभी करते हैं लेकिन आजकल प्यार को समझने वाला कोई नहीं हैं। आजकल तो प्यार शब्द का इतना दुरुपयोग हो रहा है कि कदम कदम पर इसके अर्थ को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। परन्तु हम पूरे यकीन से कह सकते हैं कि प्यार कभी किसी को नुक़सान पहुंचा ही नहीं सकता। प्यार हमने भी किया है और हमें भी अपना प्यार नहीं मिला है। फिर भी हमारे दिल में उसके लिए ना तो कभी प्यार कम हुआ है और ना ही कभी हमारे मन में तो कभी किसी को नुक़सान पहुंचाने की बात ही आईं हैं। हमे तो प्यार ने ही जीना सिखाया है। हमारे जीवन को बेहतर बनाया है। इसलिए हमारा मानना है कि प्रेम संबंधों में हो रहे हत्या और आत्महत्या का मूल कारण प्रेम नहीं है बल्कि हमारी अज्ञानता, नासमझी और मानसिक विक्षिप्ता है। क्योंकि प्रेम और हिंसा दोनों एक साथ नहीं हो सकते। जहां प्रेम है वहां हिंसा नहीं हो सकता और जहां हिंसा है वहां प्रेम नहीं हो सकता। 
दरअसल आजकल हम जिसे प्रेम समझते हैं। वह वास्तव में केवल शारीरिक आकर्षण, वासना और कामना से ज्यादा कुछ नहीं है। हम इसे शारीरिक प्रेम भी कह सकते हैं क्योंकि यह शारीरिक आकर्षण से उत्पन्न होता है। जैसे, हमे किसी का चेहरा पसंद आ जाता है। किसी की आंखें पसंद आ जाती है। किसी की बातें अच्छी लगने लगती है या हम किसी की पर्सनालिटी की तरफ आकर्षित हो जाते हैं। कभी-कभी यहीं आकर्षण प्यार में बदल जाता है। शुरुआत में तो हमें यहीं लगता है कि हमें सच्चा प्यार हो गया है लेकिन धीरे-धीरे हमारे भीतर कामना, वासना, मोह और अनेकों प्रकार की इच्छाएं जन्म लेने लगती है। जो हमारे प्यार पर हावी हो जाती है। हमारा प्यार लोभ और लोभ की एक मोटी सी चादर से ढक जाता है।


लोभ और मोह हम इंसानों की कुदरती फितरत है। हम जिस चीज पर मोहित हो जाते है। या जो चीज हमारी इंद्रियां को पसंद आ जाती है। हम उस पर अपना अधिकार जमाना चाहते हैं। उसे यथासंभव हासिल करना चाहते हैं। हम अपने इच्छाओं की पूर्ति के लिए हरसंभव प्रयास करते है। और जब हमारी इच्छाओं की पूर्ति नहीं हो पातीं तो हमें दुख होता है। हमारे मन में क्रोध, ईर्ष्या, घृणा, नफरत और जैसी अनेकों नकारात्मक भावनाएं जागृत होने लगती है। जिसके कारण हमारे दिमाग में नकरात्मक विचारों का‌ आवेग उठने लगता है। हमसे जिन लोगों के अंदर करूणा, प्रेम, त्याग, समर्पण और सहनशीलता जैसे अच्छे गुण होते हैं, अथवा जो लोग ज्ञानी और समझदार होते हैं। वे इस नकरात्मक भावनाओं को सकारात्मक भावनाओं में परिवर्तित कर देते हैं। परन्तु जिन लोगों में इन गुणों की कमी होती है। वे इस नकारात्मक उर्जा को संभाल नहीं पाते और हत्या-आत्महत्या जैसे कदम उठा लेते हैं। इस प्रकार हम अपने‌ शरीर, समय, धन और जीवन को तो नष्ट करते ही हैं। उसके साथ-साथ हम दुसरों की खुशियों को भी छीन लेते हैं। अब आप खुद सोचिए कि क्या यही प्यार है। नहीं यह प्यार नहीं पागलपन है क्योंकि
प्यार जीना सिखाता है मरना और मारना नहीं।

कहा जाता है कि इंसान गलतियों का पुतला है और हमारा भी मानना है कि कोई भी इंसान परफेक्ट नहीं है। हर इंसान में कुछ ना कुछ कमियां होती है इसलिए गलती किसी से हो सकती है। लेकिन अच्छी बात यह है कि हम चाहे तो अपनी सोच में बदलाव करके अपने अंदर की बुराईयों को मिटा सकते हैं। वैसे भी इंसान वही है जो अपनी गलतियों को स्वीकार कर लेता है और उसे सुधारने की कोशिश करता है।
देखिए हमारे जीवन में जो भी अच्छी या बूरी चीजें होती हैं। उसके लिए हमारे विचार और भावनाएं जिम्मेदार होती है। अगर हम अपने निगेटिव विचारों और भावनाओं को कंट्रोल कर ले और थोड़ी समझदारी का प्रयोग करके उन्हें पोजिटिव विचारों में परिवर्तित करना सीख जाएं तो हम जीवन में किसी भी परिस्थिति से बाहर निकल सकते हैं। 


देखिए प्यार में हत्या और आत्महत्या अधिकांशतः पांच परिस्थितियों में होती है।‌
1.एकतरफा प्यार - एक तरफा प्यार उसे कहते हैं। जब हमे किसी से प्यार होता है लेकिन सामने वाले को हमसे प्यार नहीं होता। अब इसके दो कारण हो सकते हैं, हो सकता है कि उसे हमसे प्यार ना हो बल्कि उसे किसी और से प्यार हो। या ये भी हो सकता है कि उसके दिल में प्यार मोहब्बत जैसी फिलिंग्स ही ना हो। ऐसे में हम या तो उसे भूला सकते हैं या चाहे तो उचित और नैतिक तरीके से उसके दिल में अपने लिए प्यार जगाने की कोशिश कर सकते हैं। अगर उसके प्रति हमारा प्यार सच्चा और गहरा है तो हम उससे मन ही मन जीवन भर प्यार कर सकते हैं। भले ही वह हमसे प्यार करें या ना करें। वैसे भी प्यार का मतलब त्याग और समर्पण होता हैं। सच्चा प्यार करने वाले लोग अपने प्यार की खुशी के लिए अपनी खुशियों को भी कुर्बान कर देते हैं। सच्चे प्यार में ऐसी कोई शर्त नहीं होती कि आप जिससे प्यार करते हैं वह भी आपसे प्यार करे। मीरा और शबरी का निश्छल और निस्वार्थ प्यार इसके सबसे बेहतरीन उदाहरण है। परन्तु आजकल तो हमारे प्यार में केवल स्वार्थ और अहंकार भरा हुआ है। हम प्यार के नाम पर अपने वासनाओं और इच्छाओं की पूर्ति करना चाहते हैं। इसलिए हम प्यार में जोर जबरदस्ती पर उतर आते हैं। जो कि बिल्कुल ग़लत है। यहीं वजह है कि आजकल अक्सर दुराचार, एसिड अटैक, अपहरण, हत्या और आत्महत्या के मामले सामने आते रहते हैं। हमे यह सोचना चाहिए कि प्यार कोई वस्तु नहीं है जो जबरदस्ती हासिल की जा सकें।

2.‌प्यार में बेवफाई- श्रद्धा और विश्वास ही वह धागा है जो प्यार के रिश्ते को जोड़ कर रखता है। लेकिन जब कोई हमारे विश्वास को तोड़ देता है। हमारे दिल को तोड़ देता है तो हमारे भीतर दुःख, क्रोध, घृणा, नफरत और प्रतिशोध जैसी भावनाएं प्रकट होती है। हमारे ‌मन में हत्या या आत्महत्या के विचार भी आने लगते हैं। ऐसे में हमें संयम और समझदारी से काम लेना चाहिए और अपनी नकरात्मक भावनाओं को कंट्रोल करना चाहिए। ऐसे वक्त में आत्मसुझाव की टैकनीक का प्रयोग करना चाहिए। मन को समझाने के लिए आत्मसुझाव एक बेहतरीन उपाय है। जिसमें नकरात्मक विचारों को सकारात्मक विचारों में बदला जा सकता है। आपको सोचना चाहिए कि जो होता है अच्छे के लिए होता है। अच्छा हुआ कि उसका असली चेहरा सामना आ गया। अच्छा हुआ कि एक चरित्रहीन और धोखेबाज इंसान से पीछा छुट गया। हमे सोचना चाहिए कि अगर उसकी खुशी इसी में है तो कोई बात नहीं। वह जहां भी रहे जिसके साथ भी रहे हमेशा खुश रहें। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हम जिसे बेवफाई समझते हैं। वह किसी की मजबूरी हो। हो सकता है कि वह परिवार,समाज और हालातों के आगे मजबूर हो गया हो। इसलिए हमें उसकी मजबूरी को भी समझना चाहिए।

3.प्यार में जुदाई- जियेंगे तो साथ और मरेंगे तो साथ। अक्सर लोग भावनाओं में बह कर यह कसम खा लेते हैं। लेकिन हर किसी के लिए इस वादे को निभाना मुमकिन नहीं होता। क्योंकि जीवन में प्यार के अलावा और भी बहुत सी जिम्मेदारियां होती है। और भी बहुत से कर्तव्य होते हैं। जिनको निभाना प्यार के वादे से भी ज्यादा जरूरी होता है। इसलिए यहीं कसम कई बार हत्या और आत्महत्या का कारण बन जाती है। क्योंकि आजकल लोग इसे अपने इगो से जोड़ लेते हैं। प्यार में जब जुदाई आएं तो हमें राधा और कृष्ण के प्रेम से सीखना चाहिए। जिन्होंने अपने कर्तव्य पालन के लिए एक दूसरे की जुदाई को खुशी-खचशी स्वीकार कर लिया। राधा और कृष्ण का प्यार हमेशा सिखाता है कि प्यार को निभाने के लिए दूसरों को एक साथ रहना जरूरी नहीं है। हम एक दूसरे से दूर रहकर भी अपने प्यार को अमर बना सकते हैं।

प्यार में हिंसा के लिए कुछ और वजहें भी देखी जाती है। जैसे आजकल प्यार में रूकावट आने पर लोग हिंसा पर उतर आते हैं। ऑनर किलिंग में भी कुछ मां बाप अपनी झूठी शान और इज्जत को बरकरार रखने के लिए अपने ही औलाद की बलि चढ़ा देते हैं। जिसके वजह से कई लोगों की जिंदगी कोर्ट कचहरी और जेलों में बीत जाती। हमारी लाखों जिंदगियां बर्बाद हो जाती है। हजारों परिवार तबाह हो जाते हैं। बस छोटी-छोटी बातों के लिए जिसे हम थोड़ी सी समझदारी ‌दिखा कर आराम से सुलझा सकते हैं तथा प्यार में होने वाली हिंसा से बच सकते हैं।

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