motivational speech हम कल भी गुलाम थे और आज भी गुलाम हैं

दमी बड़ा ही मतलबी और दुष्ट प्रकृति का प्राणी है। वह बाहर से चाहे कितना भी सभ्य बनने की कोशिश कर ले किंतु इससे उसकी फितरत नहीं बदल जाती। कहने को तो आदमी एक समाजिक प्राणी है परंतु हमेशा एक आदमी दूसरे आदमी का शोषण करने में लगा रहता हैं। अमीर आदमी गरीब आदमी का शोषण करता है। शक्तिशाली आदमी अपने से कमजोर आदमी का शोषण करता है और बुद्धिमान आदमी मंदबुद्धि आदमी का शोषण करता है। यानी हर बड़ी मछली छोटी मछली को खाना चाहती है। आदमी की इसी फितरत की वजह से इस दुनिया में गुलामी प्रथा की शुरुआत हुई। मध्यकालीन युग के दौरान युरोप अमेरिका और अफ्रीका महाद्वीपों में गरीब और काले लोगों को उनके घरों से पकड़-पकड़ कर गुलाम बनाया जाता था। उनको मारपीट करके जबरन काम कराया जाता था और इंकार करने पर उनके साथ जानवरों जैसा सुलूक किया जाता था। हमारे देश ने भी हजारों सालों तक गुलामी का दंश सहा है। हमारी पुरानी पीढ़ीयां भी हजारों सालों से वंशानुगत रूप से गुलामी करतीं आ रही है। कभी पूरोहितों की, कभी जमींदारों की तो कभी अंग्रेजो की। और कहते हैं ना कि अगर एक बार कोई आदत लग जाए तो आसानी से नहीं छुटती। हमारे साथ भी ठीक यही हुआ है।‌ सदियों से गुलामी करते-करते हमें गुलामी की आदत लग चुकी है। भले ही हम शारीरिक गुलामी से आजाद हो गए हैं परन्तु मानसिक रूप से हम आज भी गुलाम है। नमस्कार दोस्तों हमारा नाम है दिनेश नीर और हमारे ब्लॉग में आप सभी का स्वागत है। जी हां दोस्तों आपने सही पढ़ा है। हमारा देश अभी आजाद नहीं हुआ है। हम अभी भी गुलामी की जिंदगी जी रहे हैं। यकीन नहीं आता तो इस आर्टिकल को पढ़ लीजिए आपको भी हमारी बातों पर यकीन हो जाएगा।

motivational speech in Hindi|मोटिवेशनल स्पीच इन हिन्दी

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सबसे पहले हम आपको गुलामी का मतलब समझा देते हैं। गुलामी का मतलब है, अपने आत्मसम्मान, अपने जमीर को बेच देना। अपनी आजादी को किसी के हाथों बेचकर उसकी मालकियत स्वीकार कर लेना। बिना सोच विचार किए ही किसी की बात मान लेना और पता है। गुलामी भी दो प्रकार की होती है। शारीरिक गुलामी और मानसिक गुलामी। शारीरिक गुलामी उसे कहते हैं,जब हमें किसी भय से भयभीत होकर मजबूरी में करना पड़ती है। मानसिक गुलामी उसे कहते हैं,जब हम अपनी इच्छा से किसी की गुलामी करते हैं। इस वीडियो में हम शारीरिक गुलामी की बात नहीं करेंगे क्योंकि कोई इंसान भले ही शारीरिक रूप से गुलाम है लेकिन अगर वह मानसिक रूप से आजाद हैं तो वह एक ना एक दिन शारीरिक गुलामी से भी आजाद हो जाएगा। परन्तु अगर कोई इंसान मानसिक रूप से गुलामी को स्वीकार कर चुका है तो वह कभी आजाद नहीं हो सकता क्योंकि उसे गुलामी की आदत पड़ चुकी होती है। 


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दुःख की बात यहीं है कि हमारे देश के लोगों को भी गुलामी की आदत पड़ चुकी है। आज अगर हमारा देश गरीबी, महंगाई भ्रष्टाचार और आर्थिक बदहाली का सामना कर रहा है तो इसके जिम्मेदार हमारी गुलाम मानसिकता है। इसी गुलाम मानसिकता की वजह से आज हम अमेरिका,रूस चीन और जापान जैसे देशों से काफी पीछे है। हमारे देश में गुलामों की कोई कमी नहीं है। सभी तरह के गुलाम हैं यहां। धर्म के गुलाम, जाति के गुलाम, परंपराओं के गुलाम, आदतों के गुलाम, वासना के गुलाम, नशें के गुलाम, किस्मत के गुलाम, हालातों के गुलाम और कुछ जोरू के गुलाम भी है। अब जब गुलामों का जिक्र हो ही गया है तो जरा उनका गुणगान भी कर लेते हैं।

धर्म के गुलाम बड़े श्रद्धालु और विश्वासी होते हैं। उनको चाहे कितना भी समझा दो कि भगवान मंदिर मस्जिद में ढूंढने से नही बल्कि इंसानों में ढुढने से मिलते हैं। लेकिन वे तो केवल वही मानेंगे जो भागवत और पुराणों में लिखा है। जाति के गुलाम ज़िद्दी और वफादार होते हैं। वे अपनी जाति की इज्ज़त लिए जान की बाजी लगाने से भी नहीं चुकते। परंपराओं के गुलाम बड़े आज्ञाकारी होते हैं। उनसे आप ज्ञान विज्ञान के बारे में कितना भी तर्क वितर्क कर लो लेकिन आखिर में उनका यहीं कहना होता है कि आपकी बात ठीक है लेकिन हम अपनी खानदानी परम्परा को नहीं छोड़ सकते। आदतों के गुलाम भी किसी से कम नहीं है। उनको आप समझा समझा कर थक जाओगे लेकिन वे अपनी आदतों से बाज नहीं आएंगे। नशें के गुलामों को अपनी गुलामी से इतनी मोहब्बत है कि वे परिवार छोड़ देंगे,धन छोड़ देंगे, इज्जत छोड़ देंगे मगर नशा नहीं छोड़ेंगे। किस्मत के गुलामों को किस्मत पर इतना यकीन होता है कि वे भले ही सारी जिंदगी ग़रीब में गुजार देंगे लेकिन किस्मत से कभी बगावत नहीं करेंगे। हालातों के गुलाम जिंदगी भर अपने बुरे हालातों का रोना होते रहते हैं लेकिन अपने हालातों से लड़कर उसे बदलने की कोशिश नहीं करते। और कितना बताएं गुलामी के बारे में। आजकल तो लोग सोशल मिडिया के भी गुलाम बनते जा रहे हैं। 


मोटिवेशनल बातें इन हिंदी

दरअसल हमारे देश में बच्चे के जन्म के साथ ही गुलामी की जंजीरें पहनानी शुरू हो जाती है। लड़कियों को बचपन से ही सिखाया जाता है कि तुम अपने पति और बच्चों की गुलामी करने के लिए पैदा हुई हो। उनकी गुलामी करना ही तुम्हारा फर्ज है। छोटी सी उमर में ही मां बाप उसे एक अनजान खुटे से बांध आते हैं। वे एक बार भी उससे नहीं पुछते कि बेटी तुम क्या बनना चाहती हो। तुम्हारे सपने क्या है। और बेचारी सीधी-साधी स्त्री अपने परिवार की खुशी के अपने सपनों को दफन कर देती है, अपने अरमानों का गला घोंट‌ देती है।‌ दरअसल हमारे देश के लोगों को गुलामी रास आ चुकी है इसलिए वे गुलामी से मुक्त होने की कोशिश ही नहीं करते। या यूं कहें कि वे गुलामी से मुक्त होना ही नहीं चाहते। क्योंकि गुलामी से मुक्त होने के लिए जोर लगाना पड़ता है। नये-नये रास्ते बनाने पड़ते हैं। कभी खुद से तो कभी दुसरो से भी लड़ना पड़ता है। आजादी पाने के संघर्ष करना पड़ता है। लेकिन हम तो ठहरे निठल्ले और कायर लोग। हमसे ये सब कहां होगा। इतना रिस्क कौन लेगा। हम तो वहीं करेंगे जो हमारे बाप दादा करते आ रहे हैं। हमें दिमाग लगाने की क्या जरूरत है। जब हमारे बाप दादा मानते हैं तो हम भी मानेंगे। हमें तो भेड़ बकरियों की तरह एक दूसरे के पीछे चलने की आदत है। सब जिधर जा रहे हैं हम भी उधर ही जाएंगे। हमें तो आराम की जिंदगी पसंद है। कौन बेकार की टेंशन पालने जाए। आखिर होगा तो वहीं जो किस्मत में लिखा है। सबकुछ करने वाला तो ऊपर बैठा है। हमे तो बस दो वक्त की रोटी कपड़ा और एक मकान मिल जाए वहीं बहुत है। गुलामी हमारे दिमाग में इस कदर बैठ गई है कि हम अपनी ताकत ही भूल गए हैं। हम भूल ही गए हैं कि हमारे पास भी बुद्धि और विवेक है। हमारे पास भी उतनी ही प्रतिभा और संभावनाएं है। जितनी औरों के पास में है। हां एक बात हम कभी नहीं भूलते कि किस्मत का लिखा मिट नहीं सकता। हम समय-समय पर किस्मत और ईश्वर को दोष देना नहीं भूलते। हम अपने बुरे हालातों के लिए कभी सरकार को दोष देते हैं तो कभी नसीब को। हम इसी इंतजार में रहते हैं कि कभी तो किस्मत पलटेगी। कभी तो अच्छे दिन आएंगे। परन्तु हम भूल जाते हैं कि अच्छे दिनों के लिए बूरे दिनों से लड़ना पड़ता है। मगर लड़ेगा कौन आखिर हम बुजदिल और कायर जो ठहरे। 


इमोशनल मोटिवेशनल स्पीच

देखिए हम इंसान जो हैं मुल से एक स्वतंत्र प्रकृति के जीव हैं और स्वतंत्रता हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। हम में से कोई नहीं चाहता कि हमारे जीवन की डोर किसी और के हाथों में हो। शायद आप भी नहीं चाहते होंगे कि आपका भविष्य किसी और के हाथों में हो। कोई और तय करे कि आपको कैसे जीना है। आप भी नहीं चाहते होंगे कि दुनिया आपके आत्मसम्मान को रौंदती रहें। आप भी नहीं चाहते होंगे कि आप जिंदगी भर मजबूरियों की चक्की में पीसते रहें। हम भी नहीं चाहते हैं कि आप गुलामी की जिंदगी जीएं। यहां हमारे कहने का ये मतलब नहीं है कि आपको कोई जांब नहीं करनी अथवा अपनी जांब को छोड़ देनी चाहिए। अगर आपकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं है या आपको काम के बदले उचित पैसे मिल रहें हैं तो समय के प्रवाह को देखते हुए नौकरी करने में कोई बुराई नहीं है। लेकिन आपको अतिरिक्त प्रयास करके ऐसी स्थिति में पहुंचने की कोशिश करना चाहिए जहां आपको किसी के आगे मजबूर ना होना पड़े। और हां जहां आपका शोषण हो रहा हो या आपके आत्मसम्मान को रौंदा जा रहा हो। ऐसी जगह पर आपको नौकरी नहीं करनी चाहिए। किसी ने सच ही कहा है कि एक गुलाम इंसान और एक मरे हुए इंसान में कोई ज्यादा फर्क नहीं होता। जब इंसान को गुलामी की आदत पड़ जाती है तो वह अपनी ताकत भूल जाता है। वह भूल जाता है कि उसके अंदर कितनी प्रतिभा और संभावनाएं छुपी हुई। उसके जीवन का कमल जो खिलकर फूल बन सकता था। पुर्ण रुप से विकसित नहीं हो पाता। एक गुलाम इंसान चाहकर ना तो खुलकर जी सकता है और ना ही अपने विचारों और भावनाओं का खुलकर इजहार नहीं कर सकता है। एक गुलाम इंसान की जिंदगी नरक के समान है जिसकी आग में वह अंदर ही अंदर जलता रहता है। तो अगर आप भी मानसिक गुलामी से मुक्त होना चाहते है तो प्लीज़ डर और आलस छोड़कर अपने कंफर्ट जोन से बाहर निकलें और जो सपने अधूरे रह गए हैं। उन सपनों को पूरा करें। जीवन में सफलता हासिल करें ताकि आप एक सुखी और खुशहाल जिंदगी जी सके।


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