A true love story:- अधूरे प्रेम की दिल को छू लेने वाली दर्द भरी सच्ची प्रेम कहानी


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  A real love story

"उई मां" 
उसने मेरे उंगलियों पर इतने जोर से काटा कि मेरी चीख निकल गई। मैंने गुस्से और हैरानी का मिश्रित भाव लिए उसकी तरफ देखा। वह अपनी जीत पर इतराती हुई मंद-मंद मुस्कुरा रही थी। उसकी मनमोहन मुस्कान में ऐसा जादुई आकर्षण था कि उसकी जादुई मुस्कान के प्रभाव में मैं एक पल के लिए खो सा गया। बड़ी-बडी नशीली आंखें, बारीकी से तराशे गए नाक-नकश, मोती जैसे चमकते दांत, हल्के गुलाबी गाल और गालों के दोनों तरफ लहराते काले रेशमी बालों में वह पारियों वाली खूबसूरती लिए हुई थी। ऊपर से उसकी मोहक मुस्कान एक जादुई प्रभाव क्रियेट कर रही थी। उसने धीरे से नजरें झुकाई तो मेरे बदन में झुरझुरी सी दौड़ गई। एक हल्की सी सरसराहट हुई तो मैं समझ गया कि वह मेरे दिल के उपवन में प्रवेश कर चुकी है।
"इतने बॉडी-बिल्डर हो कर भी एक लड़की से हार गए"
प्रताप ने ताना कसते हुए जब मेरे घुटनों को हिलाया तब मैं होश में आया। लेकिन तब तक वह मेरे दिल की जमीन पर उतर कर एहसास वाले हिस्से पर कब्जा कर चुकी थी। 


मैं कुछ नहीं बोल पाया। बस अपनी उंगली में चुभे उसके दांतों के निशान को देखता रहा।
बसंत, हेमंत और सावनप्यार का कहानियां अक्सर इन्हीं तीन महीनों में शूरू होती है। यह मैंने किसी किताब में पढ़ा था। अचानक मुझे याद आया कि वह सावन का महीना था। आसमान में बादलों का झुंड बारिश की योजना बना रहे थे। जिसे देखकर गांवों में धान रोपाई की तैयारियां शुरू हो चुकी थी। हम जैसे किशोर उम्र के लड़कों के पास कोई काम-धाम नहीं था क्योंकि घर गृहस्थी के कामों में हमारी कोई रूचि नहीं थी और पढ़ाई तो हम छोड़ ही चुके थे। बस दिनभर क्रिकेट खेलते और नए-नए फालतू के आइडियाज को आजमाते रहते।
 "मुझे आज तक समझ में नहीं आया कि ताश कैसे खेला जाता है। क्या तुम लोगों को ताश खेलना आता है? गांव कुछ निकम्मे युवकों को ताश खेलते देखकर मैंने प्रताप और एजाज से पूछा। 
"हां मुझे खेलना आता है।" प्रदीप ने अपनी धाक जमाई। 
"मुझे भी सीखना है, चलो आज ताश खेलते हैं।"
मैंने उत्साहित हो कर कहा तो वे दोनों तैयार हो गए।


प्रदीप पता नहीं कहां से एक पुरानी ताश का बंडल उठा लाया और हम तीनों गांव के ही एक अंकल के बैठके में ताश खेलने बैठ गए। मैं तो ताश खेलने में बिल्कुल अनाड़ी था। बस उल्टे सीधे दांव खेलकर अपनी पत्तियां गंवा रहा था। प्रदीप हर बार बाजी जीत कर खुद को जीनियस समझ रहा था। 
"अरे डेढ़-डेढ़ फुट के छोरा यहां बैठकर ताश खेल रहे हैं।" मैं अपनी बार-बार कटती हुई पत्तियों को बचाने के लिए दिमाग लगा रहा था। तभी पीछे से किसी लड़की की आवाज आई। आवाज सुनकर मैं पीछे पलटा तो अंकल की बेटी सितारा के साथ खड़ी एक खुबसूरत लड़की कमर पर दोनों हाथ रखे हम तीनों को ऐसे घूर रही थी। जैसे हमने बहुत बड़ा गुनाह कर दिया हो। वह हमारे गांव की ही एक लड़की थी और अंकल के बेटी की सहेली थी। मैंने पहले भी उसे गांव में कई बार देखा था। लेकर मैंने उसे कभी नोटिस नहीं किया था। वैसे भी मुझे लड़कियों से बात करने में संकोच महसूस होता था।
"हां तो तुम्हें क्या है!" प्रदीप अकड़ कर बोला। शायद वह उसके स्वभाव से परिचित था। 
"अच्छा! एक तो चोरी ऊपर से सीनाजोरी। कहते हुए वह तेजी से सामने पड़े ताश के पत्तों पर झपटी। प्रदीप ने पहले ही उसके इरादे को भांप लिया था। उसने बड़ी फुर्ती से सभी पत्तों को मुट्ठी में समेट लिया। यह देखकर अब वह और भड़क गई और उससे भिड़ कर छीनने की कोशिश करने लगी। अब प्रदीप भी समझ गया कि वह ज्यादा देर तक ताश के पत्तों की रक्षा नहीं कर पायेगा। इसलिए उसने बड़ी होशियारी में उन्हें मेरे हवाले कर दिया। अब ताश के पत्ते मेरे फौलादी मुट्ठी में कैद थे। वह एक पल के लिए तो ठिठकी लेकिन अगले ही पल मेरी तरफ बढ़ गई। प्रदीप की ढिठाई देखकर अब मेरे अंदर भी हौसला आ गया था।
"लो छीन सको तो छीन लो।" मैंने मुस्कुराते हुए सहजता से बंद मुट्ठी को उसके आगे कर दिया। मुझे अपनी ताकत पर पूरा भरोसा था। उसने कुछ सोचते हुए अपनी सहेली की तरह निगाह दौड़ाई। सितारा मुस्कुराती हुई सारा तमाशा देख रही थी। उसने आंखों ही आंखों में उसका हौसला बढ़ाया। वह थोड़ा मुस्कुराई और मेरा चैलेंज स्वीकार कर लिया। अगले ही पल वह पुरी ताकत के साथ बंद मुट्ठी को खोलने में लग गई। जो कि एक लड़की के लिए तो क्या मेरी उमर के सभी लड़कों के लिए टेढ़ी खीर था। मैं बचपन से ही कसरत करता था और जुडो कराटे की प्रैक्टिस किया करता था। अतः मुझसे बड़ी उम्र के लड़को में भी मेरा अलग ही रौब था। काफी कोशिश करने के बाद भी जब वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाई तो खिसिया कर उसने मेरी उंगलियों में अपने मोती जैसे दांत गड़ा दिए। अचानक हुए दर्द के एहसास से मेरी मुठ्ठी खुल गई और अगले ही पल उससे ताश के पत्तों को सैकड़ों टुकड़े कर दिए। मैं अवाक देखता रह गया।

पता नहीं ये प्यार भी क्या बला है। कब कहां और किससे हो जाएं। पता ही नहीं चलता। वैसे तो पहले भी मैंने उसको कई बार देखा था लेकिन लेकिन अब ऐसा लग रहा था कि उससे खुबसूरत दुनिया में और कोई लड़की नहीं है। वहां से मैं सीधा अपने घर आया और अपने कमरे में घुसा कर दरवाजा भीतर से बंद कर लिया। धीरे से मैंने अपनी उंगलियों पर मौजूद उसके दांत के निशान को सहलाया और अपने होंठों के करीब ले आया। मेरी उंगलियों में अभी तक उससे सांसों की खुशबू उठ रही थी। दिल को मदहोश कर देने वाली खुशबू मेरे नथुनों से टकराईं और सांसों के रास्ते धड़कन में उतर गई। मेरे होंठ मुस्कुराए और उन्होंने उंगलियों छू लिया। मेरे दिल की एकदम से इतनी तेज हो गई कि लगने लगा कि हार्ट अटैक आ जायेगा। मैं वहीं बिस्तर पर बैठ कर धड़कनों पर काबू में करने की कोशिश करने लगा।‌ 16 साल की छोटी उमर में ही मुझे दुनिया की सबसे भयंकर रोग लग चुका था। हां मुझे प्यार हो चुका था। बिल्कुल सच्चा वाला प्यार। उस दिन रात भर मैं सो नहीं पाया। उसका चेहरा बार-बार मेरी नज़रों के सामने आ रहा था। 
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अगले दिन सुबह होते ही मेरा दिल उसके दीदार को मचलने लगा। मैं घर से निकलकर जैसे ही गांव के चौराहे पर पहुंचा। वह सामने से आती दिखाई दी। दिल एक बार फिर से अपनी रफ़्तार पकड़ने लगा। धीमे-धीमे कदमो से चलती हुई वह मेरे बगल से गुजर रही थी। अचानक से झुकी हुई नजरे उठी और मेरे नजरों से टकराकर वापस नीच झुक गई। बस एक बार मुड़कर देख ले तो मैं समझूंगा कि इसे भी मेरी तरह कुछ हुआ है। गली से मुड़ते हुए वह अचानक से पलटी और मेरी तरफ देखकर हल्की सी मुस्कुराहट बिखेर गई। ऐसा लगा जैसे मेरा दिल उछल कर बाहर आ जाएगा।
मैं बचपन से ही बहुत बदमाश और दबंग लड़का था। पूरे गांव में मेरे शैतानी के किस्से मशहूर थे। लेकिन अब मैं बिल्कुल बदल चुका था। अब दुनिया बेहद खूबसूरत नजर आ रही थी। हालांकि सुरज भी वहीं था। पशु-पक्षी भी वहीं थे। फूल भी वहीं थे जो पहले थे। परन्तु मुझे उनमें कुछ नयापन सा लग रहा था। अब मुझे सूरज की किरणों में प्यार के सात रंग नजर आ रहे थे। खिलते हुए फुलों को देखकर दिल में एक अजीब सी कशिश होती। चिड़िया की चहचहाहट सुनकर मेरा दिल खुशी से झूम उठता। मुझे सिर्फ उससे ही नहीं प्राकृति की हर चीज से प्यार हो गया था। कभी मैं बकरी के मेमने को प्यार करता। कभी कुत्तों को प्यार से सहलाता तो कभी आम के पेड़ों को बाहों में भर लेता। मेरे दिल में प्यार का समंदर उतर आया था। वह पूरी तरह मेरे ख्यालों में बस गई थी। हर घड़ी दिल में सिर्फ़ उसका हाथ ख्याल रहता। बस उसकी एक झलक पाने के लिए बहाने तलाशने के अलावा मुझे और कोई काम ना था। 
"वह कल तुम्हारे बारे में पूछ रही थी।" प्रदीप ने मिलते ही बताया। "
अच्छा! क्या पूछ रही थी?" मैंने बेताबी से पूछा।
"पूछ रही थी कि वह कहां है।" प्रदीप मजा लेते हुए बोला। 
"अच्छा उसका नाम क्या है?" मैंने पूछा।
"अंजलि।" 
उसका नाम भी उसकी तरह खुबसूरत है।
"अंजलि" कभी मैं पेन से उसका नाम लिखता तो कभी पेड़ो पर गोद कर। एक बार तो मैंने अपने कलाई पर ब्लेड से चीर कर उसका नाम लिख दिया। वह आहिस्ता-आहिस्ता मेरे दिल की अनंत गहराइयों में उतरती जा रही थी। सुबह से लेकर देर रात तक उसके आस-पास रहने की कोशिश करता। इस दौरान मैं उसे देखता रहता और वह मुझे देखती रहती बस इसके अलावा और कोई बात नहीं होती। धीरे-धीरे प्यार की यह कहानी आगे बढ़ने लगी। हालांकि कभी-कभी मुझे महसूस होता कि प्यार की जितनी आग मेरे भीतर है उतनी आग उसके भीतर नहीं है। परंतु मुझे उससे कोई लेना देना नहीं था। क्योंकि मेरे प्रेम में कोई कामना,वासना या महत्वकांक्षा नहीं थी। मेरा प्रेम बिल्कुल सच्चा और पवित्र था।


"वह गांव के लिए घास काटने खेतों की तरफ जा रही है।" सुबह के भोजन के बाद मैं गांव के चौराहे पर खड़ा उसकी ही राह देख रहा था। तभी प्रताप ने आ कर खबर दी। 
"चलो हम भी उनके साथ चलते हैं।" उसने कहा तो मैंने भी हामी भर दी। कुछ ही फासले पर एजाज का घर था। हमने आवाज देकर उसे भी बुला लिया। गांव से बाहर निकलते ही वह अपनी तीन चार सहेलियों के साथ जाती हुई दिखाई दी। हमने थोड़ी रफ्तार बढ़ाई और उनसे आगे निकल कर आगे-आगे चलने लगे।
"आईए दोस्तों, स्वागत है आप सभी का हमारी नई दुनिया में" गांव के बाहर मौजूद बरसाती नदी को पार करते ही मैंने उसकी तरफ देखकर दोनों बाहें फैलाते हुए बड़े ही रूमानी अंदाज में जोर से ये जुमला फ़रमाया। 
"ओ जुल्फों वाले हीरो, ज्यादा मत बनो वरना एक ही सेंडल में ठीक कर दूंगी।" पता नहीं उसने क्या समझ आया कि वह नदी के उस पार से ही जोर से गुर्राई।
"लो सुनो वह तुम्हें गाली दे रही है।" प्रताप ने ठहाका मारते हुए चुस्की ली। 
शायद उस लगा कि मैंने कुछ अश्लील बातें कही हैं। मुझे गुस्सा तो बहुत आया लेकिन यहीं सोचकर मैं चुप रह गया। थोड़ा सा डर भी लगा कि कहीं ये लोग घर जाकर अपने घरवालों से कुछ उल्टा सीधा ना कह दें। खैर हमलोग आगे खेतों की तरफ बढ़ गए और वह अपने सहेलियों के साथ घास काटने लगी। एक डेढ़ घंटे घुम-फिर कर हम तीनों खलिहान के बीचोबीच मौजूद पाकड़ के पेड़ के नीचे आ कर उनका इंतजार करने लगे। कुछ ही देर के बाद वे सब लड़कियां भी सर पे घास लिए वहां पहुंच गई और हमसे थोड़ी ही दूर पू घास रखकर सुस्ताने लगी। 
"पूछो ना वह क्या कह रहा था।" उसकी सहेलियां उसे मेरी तरफ मुखातिब करके धीरे-धीरे फुसफुसा रही थी। शायद वे उसे तकरार करने के लिए भड़का रही थी।  लेकिन वह अपने घुटने पर सर रखे खामोशी की मिसाल बनी हुई थी। कभी वह कोहनी मार कर अपने सहेलियों को चुप कराती तो कभी सर उठा कर एक मुझे बेकरार कर देती। 
कुछ ही देर बाद वे सब जाने के लिए उठ खड़ी
 हुई। उसने बारी-बारी से सभी लड़कियों के सर पर घास का गट्ठर उठवा दिया और अंत में अकेली उसकी घास बच गई। जिसे वह अकेले नहीं उठा सकती थी।
अब वह कातर निगाहों से हमारी तरफ देखने गई।
मैंने भी उसकी गाली का बदला लेने के लिए आंखों ही आंखों में प्रताप और एजाज को इशारा किया कि वे उसकी घास ना उठाएं।
थक-हार कर वह स्वयं ही घास उठाने की‌ कोशिश करने लगी। अब मुझसे रहा नहीं गया। मैं तुरंत उसकी मदद को खड़ा हो गया। घास उठाते समय उसकी नजरें मेरी नज़रों से इतने करीब से टकराईं जैसे एक दुसरे में डुब सी गई। मैं बेहोश होते-होते बचा।
धीरे-धीरे प्यार का एक ऐसा सफर शुरू हो गया।जिसकी कोई भी मंजिल ना थी।
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"लो आ गए बाबूसाहब ड्यूटी करके। जरा पूछिए इनसे कि कहां थे दिनभर" बाबूजी मां की तरह मुखातिब हो कर बोले।
दिनभर क्रिकेट खेलकर शाम को जैसे ही मैं घर में दाखिल हुआ। बाबूजी से सामना हो गया। मैं उनकी बात को अनसुना करके रसोईघर की तरफ बढ़ गया। 
"खबरदार! जो इसे किसी ने खाना दिया।"
मेरी बेफिक्री देखकर बाबूजी का पारा और चढ़ गया।
मेरे आंखों से छलकते आंसूओं को कोई देख ना ले इसलिए मैं जल्दी से बिस्तर में घुस गया। एक तो दो तीन दिनों से उसका दिदार नहीं हुआ था और दूसरा घर में अपमान का दुःख। मेरे सब्र का बांध टुट गया और मैं फुट-फुट कर रोने लगा।

"मैं खाना नहीं खाऊंगा।"
बाबूजी के सोने के पश्चात मां मेरे लिए भोजन लेकर आई तो मैंने खाने से इंकार कर दिया। मां और बहनों के काफी मनाने के बाद भी मैंने खाना नहीं खाया। मेरे घरवाले विशेषकर बाबूजी मुझसे बहुत प्यार करते थे। मुझे याद नहीं है कि बाबूजी या मां ने कभी मुझे मारा हो। हां मेरी शैतानियों से तंग आकर कभी कभार डांट दिया करते थे। ज्यादा लाड-प्यार मिलने की वजह से मैं अत्याधिक भावुक और ज़िद्दी स्वभाव का हो गया था‌। छोटी-छोटी बातें मेरे दिल को लग जाती और अक्सर रूठ जाया करता था। 

 अगले दिन सुबह बाबूजी खाना खाकर काम पर चले गए। मां,दादी,बुआ और भाभी के काफी मनाने के बाद भी मैंने सुबह भी खाना नहीं खाया।
"तू खाना क्यों नहीं खा रहा है।"
शाम को जब सब मुझे मनाते-मनाते थक गए तो बाबूजी खाना लेकर खुद आए थे।
मैं खामोश रहा।
"देख बेटा" अब तू बच्चा नहीं रहा। अब तू जवान हो गया है। क्रिकेट खेलने से पेट नहीं भरेगा, अब जरा घर की जिम्मेदारी को भी समझ। तूझे दिखाई नहीं दे रहा है कि घर की कैसी स्थिति है। घर में दो जवान बहनें बैठी है और ना घर में अनाज है ना पास में पैसा। मैं दिनभर धूप में जलकर भी परिवार की जरूरतों को पूरा नहीं कर पा रहा हूं। क्या तूझे यह सब दिखाई नहीं देता।"
बाबूजी सिरहाने बैठकर मुझे प्यार से समझा रहे थे और मैं चुपचाप सुन रहा था।
"उठ अब खाना खा ले, वरना मैं भी खाना नहीं खाऊंगा। ऐसा अक्सर होता था। जब उनके मनाने से नहीं मानता तो वे नाराज होकर भोजन की थाली फेंक देते और चुपचाप जाकर सो जाते। फिर वह तब तक न खाते,जब तक मैं जाकर नहीं मनाता।
इससे पहले कि वे भोजन की थाली उठा कर फेंक देते। मैं उठकर हाथ धोने लगा।
शायद वे ठीक ही कह रहे थे।
पहले बाबूजी पास के कस्बे में मौजूद एक चीनी मिल के सरकारी दफ्तर में चपरासी की नौकरी करते थे। सैलरी अच्छी थी इसलिए घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। मैं उसी कस्बे के एक अच्छे इंग्लिश मिडियम स्कूल में पढ़ाई करता था। सब कुछ ठीकठाक चल रहा था। तभी किसी कारणवश चीनी मिल बंद हो गई और उनकी सैलरी आनी बंद हो गई। यहीं से हमारी जिंदगी का रूख मुड़ गया। पैसों की तंगी शुरू होते ही परिवारिक कलह शुरू हो गया। बड़े भाइयों और भाभियों ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। घर में रात दिन झगड़े
 होने लगे। बाबूजी शराब पीने लगे। गरीबी की वजह से मैं पाचंवी क्लास में ही पढ़ाई छोड़कर बाबूजी के साथ काम में लगा गया था। एक डेढ़ साल काम करने के बाद जब काम छुटा तो मैं घर बैठ गया था। दिनभर क्रिकेट खेलना और दोस्तों के साथ घूमना बस यहीं मेरा काम था।


"अरे कल दिनभर तू कहां था?"
अगले दिन प्रताप ने मिलते ही सवाल किया।
"मैं धान की रोपनी करने गया था। क्यों क्या हुआ?
 वह पूछ रही थी कि तुम्हारा दोस्त आज दिखाई नहीं दे रहा है।"
प्रताप ने बताया। उसने ये भी बताया कि वह अपने मामा के घर गई थी।
अच्छा तो अब समझ में आया कि मेरी छोटी बहन भी यहीं बात क्यों पूछ रही थी।
शायद वह कल मुझे देखने के लिए एक लड़की के साथ मुझे ढुंढते-ढुंढते खेतों तक पहुंच गई थी। मेरी छोटी बहन उसकी सहेली थी। शायद उसने उसी से पता लगता होगा कि मैं कहां हूं।
अब मैं भी दूसरों के खेतों में मजदूरी करने जाने लगा था। हालांकि मुझे यह अच्छा नहीं लग रहा था।

कहां वह एक अमीर घर की राजकुमारी और कहां तू एक गरीब मां बाप का अनपढ़ लड़का" क्या तू उसको जिंदगी की खुशियां दे पायेगा?
मुझे उसके साथ अपने ख्वाबों के महल सजाता देख मेरे दिल ने मुझे मेरी औकात दिखाई।
आज पहली बार मुझे अपनी गरीबी ....
क्रमशः 

बाकी अगले भाग में..

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